यहाँ भी गंगा के इस बदले हुए रूप को देखकर नारद जी को कुछ बेचैनी जरूर हुई पर हरी इच्छा कहते हुए वे आगे श्रीनगर पहुंचे ! अलकनंदा के किनारे बसा श्रीनगर कभी गढ़वाल के राजाओं की राजधानी हुआ करती थी ! वैसे अलकनंदा की बाढ़ ने इस रमणीक पुरानों में वर्णित श्रीनगर को कही बार उजाड़ा और मनुष्यों ने भी कुदरत से बार बार लोहा लेकर इसके अस्तित्व को मिटने नहीं दिया ! १८०३-०४ ई० में गोरखों ने अटैक करके लूट पाट मचा कर इसको फिर उजाड़ दिया था ! लेकिन अलकनंदा अठखेलियाँ करती हुयी, पर्वत श्रृंखलाएं , पेड़ पौधों की विभिन्न किस्मे, रंग विरंगे फूलों की चारों ओर बिखरी खुशबू, हरे भरे सीढीनुमा खेतों ने इस पहाडी पर्वत को कुदरत द्वारा दी गयी सौगात से आज भी सजा धजा कर खूबसूरती का ताज पहिना रखा है! नारद जी कुछ देर के लिए अलकनंदा तट पर भगवान की स्तुति में खो से गए थे ! आज यहाँ पर गढ़वाल यूनिवर्सिटी है, स्कूल हैं कॉलेज हैं, खेल के मैदान डाक खाना तार घर हैं ! यहाँ से चलकर नारद जी रुद्रप्रयाग आए, अभी तक वे अदृश्य होकर अपना सफ़र कर रहे थे, लोगों की बातें सुन रहे थे कुदरत की लीला के साथ मनुष्य निर्मित नदियों के पुल, नदियों पर बंधे बाँध, सड़कें, नदी के कुदरती बहाव को रोक कर पहाड़ों के अन्दर सुरंग बनाकर नदी के रुख को बदलने का भागीरथ प्रयत्न ! कही स्थानों पर चट्टानों के खिसकने से गाँवों की तवाही भी नारद जी की नज़रों से नहीं बच पायी ! रुद्रप्रयाग संगम मंदाकिनी और अलकनंदा का ! एक नदी मंदाकिनी केदारनाथ के शिव जी के चरणों को धोती हुई, और उधर अलकनंदा श्री बद्रीनाथ के चरण स्पर्श करती हुई पहाड़ों की चट्टानों से गरजना करती हुई, इस पवित्र स्थान पर आकर मिलती है ! समुद्र तल से २००० फीट की ऊंचाई पर बसा यह कस्बा आधुनिक साज सज्जा से युक्त धर्मशालाए और आरामदायक होटलों के कारण प्रयाटकों का आकर्षक केंद्र बिंदु है ! यहाँ से एक सड़क केदारनाथ के लिए और दूसरी बद्रीनाथ के लिए चली जाती है ! यहाँ से पंडों का राज शुरू हो जाता है, सारे धर्मशालाएं, होटल्स, लाज, आलीशान कोठियां इन पंडों की ही निजी सम्पति है ! इलाके के सबसे रईसों में है इन पंडों की गिनती ! नारद जी रूद्र पयाग से तिल वाडा अगस्त मुनि पहुंचे ! गुप्तकाशी में शिव भगवान के दर्शन किए ! किवदंती के मुताबिक़ पांडवों से रोष्ट होकर शिव जी इसी स्थान पर गुप्त हुए थे इसीलिये इसका नाम गुप्त काशी पड़ा ! फिर नारायण कोटि होते हुए, फाटा, सोनप्रयाग और पहुंचे गौरी कुंड ! गौरी कुंड मंदाकिनी नदी के तट पर बसा हुआ कस्बा है जो गर्मियों में गुलजार रहता है और सर्दियों में बर्फ से ढक जाता है, नवम्बर से अप्रेल तक मानव रहित सफ़ेद चद्दर के आवरण में लिपटा चुप चाप सूरज की तेज किरणों का इंतज़ार करता रहता है ! नारद जी ने गौरी कुंड के तप्त जल में स्नान किया, एक रात यहाँ एक लाज में विश्राम किया ! गौरी की पूजा अर्चना की प्रशाद लिया ! वहां बहुत बड़ी संख्या में लोग केदार-बद्री दर्शनों की लालसा लिए दूर दराज के इलाकों से आये थे ! इनमें अमीर भी थे जो फाटा से हेलीकाफ्टर से सीधे केदारनाथ जा रहे थे और हेलीकाफ्टर से ही वापिस फाटा आरहे थे ! कुछ मध्यवर्ग के लोग थे तो कुछ गरीब थे ! कुछ अपाहिज भी थे फिर भी दर्शन करने आये थे ! कुछ लम्बी बीमारी से ग्रस्त रोगी भी थे जिन्हें धर्माचारियों ने, ज्योतिषियों ने इस किस्म की बीमारी का इलाज केवल केदारनाथ-बद्रीनाथ यात्रा बतलाया था, वे अपने बेटे बहु या रिश्ते दारों के साथ आये थे ! कुछ लोग खच्चरों में जा रहे थे तो कुछ पैदल १४ मील की कठीन चढ़ाई चढ़ कर केदारधाम पहुँच रहे थे कुछ दर्हन करके वापिस आरहे थे ! नारद जी भी इन पैदल यात्रियों के दल में सामिल होकर जय केदार जय बद्रीनाथ कहते हुए चढ़ाई चढ़ रहे थे और इस विभिन्न श्रेणी के लोगों के बीच सफ़र का आनंद ले रहे थे ! यहाँ कोइ किसी की जातित धर्म नहीं पूछ रहा था, न किसी की अफसर साही, नौकरशाही, नेता मंत्री या घसियारा, मोची, धोबी का ही कोइ भेद कर रहा था, एक स्वर और एक आवाज गूंज रहा था जैकारा का ! विभिन्नताओं में एकता का जीता जागता प्रमाण ! आखीर नारद जी इस दल बलके साथ केदारनाथ पहुँच गए ! वहां आगे मिले उतने ही पण्डे जितने दर्नार्थी थे, वे दर्शन करने आए लोगों से उनके जिला, प्रदेश और निवास स्थान, पूछ कर अपने जजमानों को अपने साथ अपनी धर्म शालाओं, होटलों में ले जा रहे थे ! नारद जी भी एक सज्जा सजाया होटल में एक रईस के साथ ही चले गए ! क्रमशः
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