बुधवार, 29 सितंबर 2010

आज की ताजी खबरें

कामनवेल्थ गेम्स
जी हाँ इस साल भारत कामन वेल्थ गेम्स दिल्ली में करवाने की जिम्मेदारी ले चुका है ! मंत्री, संतरी, नेता, नौकरशाह सभी भागते ही नजर आ रहे हैं ! शोर तो एक साल पहले से मचा था की इस वर्ष कामनवेल्थ गेम भारत में होंगे ! सरकार ने काफे बड़ी राशि इस गेम के लिए रिजर्व कर ली गयी थी, चेयर मैन बने सुरेश कलमाडी ! देख रेख की जिम्मेदारी थी दिल्ली के मुख्य मंत्री शीला दीक्षित की ! अगस्त तक पूरा पैसा जो गेम्स के लिए रिजर्व था पता ही नहीं चला कहाँ गया लेकिन काम ज़मीन पर कुछ भी नहीं हुआ ! नेताओं ने नौकरशाहों ने बड़े बड़े ठेके अपने नाते रिश्तेदारों को दे दिए ! प्रबंधकों की आँखे तब खुली जब जवाहर लाल नेहरू स्टेडियम के पास बनने वाला पुल धरधराता हुआ नीचे आ गया ! उधर औडिटर जनरल ने गेम पर लगाए गए पूरी व्यवस्था पर ही सवालिया चिन्ह लगा दिया ! हर खरीदारी में करोंडो का हेर फेर औडिट में नजर आया ! जनता की खून पशीने की कमाई पर जिसका जहां दाव लगा वहीं डकार गए ! ऐडवरटाईजिंग कम्पनियाँ इन खेलों से किनारा करने लगे ! फिर दिल्ली सरकार की नींद खुली ! उन्होंने आनन् फानन में मार्केट में बिकनी वाली हर वास्तु पर तकस बढ़ा दिया गया, नतीजा महंगाई ! जब सिविल कामनवेल्थ गेम्स की तैयारी करने में बिलकुल असमर्थ हो गयी तो सेना की मदद
लेनी पडी ! गेम शुरू होने के एक हफ्ते पहले सेना को यह काम सौंपा गया और अब गेम तीन अक्टूबर को होने जा रहे हैं इसका पूरा श्रेय भारतीय स्थल सेना को जाता है ! भारत की इज्जत विश्व स्तर पर गिराने में सुरेश कलमाडी और उसकी फ़ोर्स ने कोई कमी नहीं छोडी थी लेकिन सेना ने ऐन वक्त पर पूरी जिम्मेवारी लेकर भारत की इज्जत बचा दी !
राम जन्म भूमि का विवाद
३० सितम्बर 2010 का दिन भारतीय इतिहास में हमेशा याद किया जाएगा ! इस दिन इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच ने अयोध्या राम जन्म भूमि पर अपना फैसला सुना कर पिछले ६० सालों से चले आ रहे विवाद को समाप्त कर दिया ! रामजन्म भूमि पर १५२८ ई० में बाबर राम मंदिर को तोड़ कर बाबरी मसजिद बनवाई थी ! १९५० से यह केश कोर्ट में पेंडिंग पड़ा था ! कोर्ट के फैसले के मुताबिक़ विवाद वाली जगह मंदिर की है और राम जन्म भूमि न्यास को सौंप दी गयी है ! सीता की रसोई वाली जगह निर्मोही अखाड़ा को और तीसरा हिस्सा सुन्नी वक्फ बोर्ड को दिया गया है ! कोर्ट के फैसले के बाद कोई अप्रिय घटना न हो इसके लिए प्रदेश और केंद्र सरकार ने सुरक्षा के पूरे प्रबंध कर रखे थे ! संतो ने अयोध्या राम जन्म भूमि को तीन भागों में बांटने के कोर्ट के फैसले के खिलाफ भारत बंद का ऐलान किया है ! शायद ही अमन पसंद लोगों को इस तरह के बंद करने और साम्प्रदायक झगणों को तूल देकर नयी समस्या खडी करने पर विष्वास होगा ! संतों का क्या है आश्रमों में हजारों लाखों इनके चेले और भक्त इन्हें चढ़ाव ही इतना चढ़ा देते हैं की इन्हें कुछ करने की जरूरत ही नहीं पड़ती ! इन्हें कौन सा किसान सैनिक मजदूर की तरह काम करना है, कौन सा स्वामी रामदेव जी की तरह लाखों करोड़ों लोगों को योगा सिखा कर उन्हें निरोगी बनाना है, या दवाइयां बनाकर गरीब लोगों तक पहुंचाना है ! हाँ देश में संतों की एक बड़ी जमात है जो कहते कुछ हैं करते कुछ हैं ! बहुत से विश्व विख्यात संतों के तो करोड़ों का बिजनिस चलता है अपने नाम पर नहीं केवल ए से प्रोफिट की राशि के लिए जो हर हफ्ते/महीने पिछले दरवाजे से इनके आश्रम में पहुँच जाती है ! फिर भला संध्या, ध्यान, पूजा, भजन कीर्तन चाबीसों घंटे तो किए नहीं जा सकते, तो जो बाकी समय बीतता है दुनिया को दिखाने के लिए की हमारी भी एक जमात है, हमारी भी एक अलग पहिचान है, बन्ध करेंगे, रैली निकलेगी संतों की, सड़क पर जाम लग रहा है लगने दो, कोई बीमार समय पर हॉस्पिटल नहीं पहुँच पाने से दम तोड़ रहा है तोड़ने दो, इन संतों ने जो ठान ली है वह करना है ! अब अगर कोई भी संगठन इस कोर्ट के आदेश पर ऐतराज करता है जनता को उसका वहिष्कार कर देना चाहिए ! इससे अच्छा फैसला इस केश पे हो ही नहीं सकता था ! हर अमन पसंद देश के नागरिक को इस फैसले पर अपनी खुशी जाहिर करनी चाहिए !
इन्डियन आइल कोर्पोरेशन के चेयर मैन
पहली वार उत्तराखंड के श्री रणवीरसिंह बुटोला जी को इंडियन आइल कोर्पोरेशन का चेयर मैन बनाया गया है ! इंग्लिस न्यूज पेपर 'हिन्दू' तथा अन्य समाचार पत्रों के माध्यम से यह खबर बिजिनेस कालम के अंतर्गत ३० सितम्बर २०१० को छपी है ! श्री बुटोला जी का जन्म ०५ मई १९५४ को हुआ था ! एम बी ए करने के बाद उनहोंने फरवरी १९९१ ई0 ओ एन जी सी ज्वाइन किया डिपुटी जरनल मैनेजर की हसियत से ! १५/११/२००२ को उनकी योग्यता और आदर्श उनको ओ एन जी सी के डारेक्टर की पोस्ट तक पहुंचा गए ! १३/०५/२००४ ई० को उन्हें ओ एन जी सी का मैनेजिंग डारेक्टर बनाया गया ! ३० सितम्बर २०१० को उन्हें ६ प्रत्यासियों में से चुन कर ऐ ओ सी का चेयर मैन बनाया गया !
भारत पाकिस्तान मसला
भारत ने हमेशा से पाकिस्तान की तरफ दोस्ती का हाथ बढाया लेकिन उसने बदले में आतंकवादियों को ट्रेंड करके हमारे शहरों कस्बों में भेज कर मार काट की, साम्प्रदायक दंगे करवाए, काश्मीर घाटी में बार बार आतंकी हमला करवाए ! एक तरफ पाकिस्तान कहता फिरता है की हम भारत के साथ शांती वार्ता के लिए तैयार हैं और दूसरी तरफ पाकिस्तान में पल रहे आतंकियों को काबू नहीं कर पा रहा है ! वहां चाहे फ़ौजी तानाशाह शासक हो या कोई सिविलियन आतंकवाद पर काबू पाना इनके बस की बात नहीं है ! अमेरिका खूब जानता है लेकिन फिर भी पाकिस्तान को सैनिक साज सामान के साथ आर्थिक मदद भी देता जा रहा है ! बार बार सुरक्षा परिषद् तथा संयुक्त राष्ट्र संघ में काश्मीर के मसले को उठाकर पाकिस्तान समस्या को सुलझाने के वजाय उलझाता जा रहा है ! फिर पाकिस्तान के साथ शांती वार्ता कैसे शुरू हो, यह्सवाल १९४८ से लेकर आज तक ज्यों का त्यों बिना किसी उत्तर के लटका हुआ है ! आगे आगे देखो होता होता क्या ?

जादूगर चूहा

नदी के किनारे एक पेड़ से हट कर एक बिल बनाकर एक चूहा रहता था ! वह सुबह ही अपनी पेट पूजाके लिए अपने बिल से निकल पड़ता था, चील, कौवे, बिल्ली, कुते, सांप और अन्य दुश्मनों से बचता बचाता जो कुछ भी भी मिल जाता खाता और वापिस अपने बिल में लौट आता ! कभी कभी तो खाली पेट ही लौट आता फिर भी भगवान् को मनाना "हे ईश्वर खाली पेट ही सही, सही सलामत तो लौट आया" ! गुजर रही थी और वह अपने में खुश था ! लेकिन उसकी खुशी ज्यादा दिन तक नहीं रही ! एक दिन सुबह सुबह वह अपने बिल से निकल रहा था की क्या देखता की पेड़ की जड़ में जो बिल है उसमें एक काला सांप घुस रहा है ! अब रात दिन वह सांप के भय से ग्रस्त रहने लगा !
और एक दिन वह सुबह सुबह अपने बिल से जल्दी ही निकल गया ! चलते चलते दुश्मनों से अपने को बचाते हुए वह नदी के किनारे किनारे वहां पहुँच गया जहां बालू ही बालू था ! वह कुछ देर उस बालू में उछलता कूदता रहा और मस्त हो कर अपने आज का भरपूर आनंद लेता रहा, यह सोच कर की पता नहीं अगले पल उसके साथ क्या होने वाला है ! फिर अचानक एक अचम्भा हो गया ! उसे उस बालू में एक चमकता हुआ गोल मोल छोटा सा लाल पत्थर नजर आ गया ! उसने उस पत्थर को अपने मुंह में दबाया और बड़ी मस्ती से खरामें खरामें अपने बिल की तरफ जाने लगा ! अब उसे किसी से भी कोई डर नहीं लग रहा था ! शरीर के अंदर एक विशेष प्रकार का आनंद उसे महसूस हो रहा था ! जैसे ही वह अपने बिल के पास पहुंचा उसे वही काला सांप नजर आया जैसे वह उस चूहे का ही इंतज़ार कर रहा हो ! आज वह चूहा उसे देख कर न डरा न उसे कोई घबराहट ही हुई ! अचानक उसके दिमाग ने सोचा, काश यह सांप गिलहरी बन जाता और सच मुच में वह सांप देखते ही देखते गिलहरी बन गया और भागता हुआ पेड़ पर चढ़ गया ! यह तो अचम्भा हो गया ! कमाल हो गया ! अभी तक वह जादुई लाल पत्थर उसके मुंह में ही था ! वह अब इतमिनान से अपने बिल में चला गया ! आज उसने पूरे दिन कुछ भी नहीं खाया था और इस चमकीले पत्थर के मिलने की खुशी में उसे लगा भी नहीं की वह भूखा है ! जब उसने पत्थर मुंह से नीचे रख दिया तो उसे भूख का आभास होने लगा ! उसने अपना दाहिना पंजा उस चमकीले पत्थर पर रखते हुए मन में सोचा 'काश' यहाँ पर मेरे लिए अन्दर सारा भोजन आ जाय, और वहां भोजन से उसका बिल भर गया ! अब उसने मन में सोचा की मेरा यह बिल एक सुन्दर घर जैसा बन जाय ! और देखते ही देखते बिल के अन्दर ही अन्दर चूहे का एक ख़ूबसूरत सा घर तैयार हो गया ! एक कमरा उसके सोने का, एक कमरा खाने का सामान रखने का, बाथ रोम और एक स्पेशल रोम जादुई चमकदार पत्थर के लिए ! दरवाजा काफी मजबूत था, जब चूहा चाहेगा तभी खुलेगा नहीं तो बंद ही रहेगा ! अब चूहे की जिन्दगी अन्य चूहों से बिलकुल भिन्न हो गयी थी ! अभी वह कुंवारा था ! अब एक सुन्दर सी चुहिया की तलाश में था ताकि शादी करके घर बसाए लेकिन जैसी दुलहन उसे चाहिए थी उसे मिली नहीं और उसने शादी का इरादा ही छोड़ दिया ! एक दिन उसके दिमाग में आया की 'आज कुछ और चमत्कार करके देखा जाय ' ! वह उस जादुई पत्थर को मुंह में दबाकर अपने दरवाजे पर बैठ गया ! सामने एक लोमड़ी आ रही थी ! चूहे को सामने देख कर उसके मुंह में पानी भर आया, वह धीरे धीरे उसको खाने की गरज से उसके नजदीक आने लगी, जब वह बहुत करीब आ गया तो चूहे ने दिमाग में सोचा, 'काश यह लोमड़ी एक छोटा मृग बन जाय और वह लोमड़ी सच मुच में एक छोटा मृग बन गया ! उसी समय उधर से एक भेड़िया आया और उस लोमड़ी बने मृग को मार कर खा गया ! अगले दिन वही भेड़िया उसके बिल के आगे से गुजर रहा था, उसकी भी नजर चूहे पर पड़ गयी, वह भी चूहे को मारने की नियत से जादूगर चूहे के नजदीक तक आ गया, फिर चूहे ने सोचा की 'काश यह भेड़िया खरगोश बन जाय और वह भेड़िया खरगोश बन गया, उसे उड़ते हुए एक चील पकड़ कर आसमान में ले जाकर खा गयी ! वैसे वह केवल हिंसक पशुवों को ही साकाहारी पशु में बदली करता था, लेकिन सारे जंगल में यह खबर आग तरह फ़ैल गयी की एक चूहा जादूगर बन गया है और वह जिसको भी चाहता है बदली कर देता है, सांप को गिलहरी, लोमड़ी को मृग, लक्कड़ बग्घे को नील गाय ! उसने तो एक मगर मच्छ को भी बदली करके मछली बना दिया है, एक जंगली कुते को जंगली बकरा बना दिया, आदि आदि ! चूहा अब घमंडी हो चला था, किसी को कुछ नहीं समझता था, जंगल के सारे छोटे बड़े जानवरों ने उसके घर के आगे से आना ही छोड़ दिया था ! यह खबर उड़ते उड़ते जंगल के राजा शेर के कानों में भी पड़ गयी ! शेर ने महसूस किया की सारे जंगल में एक अदना सा चूहे की ही बात हो रही है शेर की तो कोई बात ही नहीं करता ! चलो एक बार चल कर देखते हैं उस जादूगर चूहे के चमत्कार को ! मंत्री मंडल के कुछ सदस्यों ने शेर को चेताया भी की ये जादूगर चूहा छोटा मोटा जादूगर नहीं है बड़ा पहुंचा हुआ जादूगर है, इसे जितनी दूरी बना कर रखा जाय वही ठीक रहेगा, कहीं इसने अपना जादू हम पर आजमा दिया और हमें ही कुछ बना दिया फिर क्या होगा ! लेकिन शेर बहादुर और दिलेर था जादूगर की भभकियों से डरने वाला नहीं था ! वह अपने मंत्रियों के साथ चूहे के दरवाजे पर आ गया ! शेर को देखते ही चूहे की सांश रुक गयी, उसके दिमाग ने सोचना छोड़ दिया, उसे पता भी नहीं चला की घबराहट में उसके मुंह से कब वह चमत्कारी पत्थर निकल कर अचानक कहीं गायब हो गया ! वह बेहोश होगया, जब उसे होश आया, अपने को एक निर्बल असहाय चूहे के रूप में पाया, अब वह जान बचाने के लिए भागा भी लेकिन तब तक देर हो चुकी थी, एक बिल्ली जो काफी दिनों से उसकी तलाश में थी, ने उसे पकड़ कर उदर ग्रस्त कर दिया था ! फिर एक नयी खबर आग की तरह जंगल में फैल गयी की जादूगर चूहा परलोक सिधार गया है !

मंगलवार, 28 सितंबर 2010

रामायण के रहस्य (सातवाँ भाग)

भगवान राम अपने निजी कक्ष में बैठे हुए हैं, सोचते हैं धरती पर आने का काम पूरा हो गया है ! रघु कुल परिवार में पैदा हुआ ! "रघुकुल रीति सदा चली आई, प्राण जांए पर बचन न जाईं " ! पिता जी ने माता केकई को कभी असुरों के साथ संग्राम करते उनके द्वारा, पिता जी की जान बचाने लिए, किये गए चमत्कारिक उपाय और सच्ची क्षत्राणी के जौहर से खुश होकर दो वरदान दिए थे ! माता केकई ने जब महाराजा दशरथ के रथ की धुरी की कील निकल गयी थी और रथ कभी भी उलट सकता था और महाराजा की मृत्यु भी हो सकती थी, अपनी उंगली उस धुरी के अन्दर डाल दी और तक तक उंगली उस धुरी पर रखी जब तक सारे असुरों को महाराजा दशरथ ने यमपुरी नहीं पहुँच दिया ! यदपि रानी केकई की उंगली काफी जख्मी हो गयी थी लेकिन महाराजा दशरथ की जान ही नहीं बची थी बल्की असुरों पर विजय भी मिली थी ! इसी लिए वो दो वरदान रानी केकई को मिले थे ! भगवान राम को राज तिलक करने का दिन आया, लेकिन ऐन मौके पर रानी केकई ने महाराजा दशरथ से अपने दो वरदान पूरे करने को कहा, एक से राम को १४ साल का वनवास और दूसरे से भरत को राजसिंघासन ! अब राजा अपने वचनों से हट भी नहीं सकते थे और राम से दूर भी नहीं रह सकते थे ! राजा दशरथ को याद आई अपनी अंधी बहिन और अंधा बहनोई ! राजा दशरथ की एक ही बहिन थी और वह भी अंधी ! आखिर एक अंधे से ही उसकी शादी करके उन्हें सदा के लिए विदा कर दिया गया था ! न वे ही आए और न राजा दशरथ ही ने उन्हें कभी याद किया ! और एक दिन जब राजा दशरथ जंगल में आखेट खेलने गए हुए थे, उन्हें एक चश्मे से कुछ ऐसी आवाजें आ रही थी जैसे कोई हिरन पानी पी रहा हो ! वे शब्द भेदी वाण चलाने में माहीर थे ! उन्होंने चश्मे की तरफ गद गद शब्द पर वाण चला दिया ! वाण चश्मे पर पानी भरते हुए शरवन कुमार के जा लगा ! राजा दशरथ जैसे ही चश्मे पर पहुंचे और जा कर क्या देखते हैं कि उनके वाण से एक निर्दोष बालक की ह्त्या हो गयी है ! बालक शरवन कुमार अपने बूढ़े, अंधे माँ बाप को तीर्थ स्थानों की यात्रा करवाने के लिए ले जा रहा था ! यहाँ चश्मे के पास आकर माँ ने कहा, "बेटा शरवन बड़े जोर की प्यास लगी है, सामने चश्मे से पानी भर कर ले आ " ! वह अपने प्यासे माँ बाप को पानी पिलाने के लिए चश्मे पर पानी भर रहा था ! मरते हुए बालक ने रजा दशरथ से कहा "महाराज यह पानी मेरे प्यासे माँ बाप को पिला देना और मेरी मृत्यु के बारे में उन्हें कुछ न बताना ", यह कहते हुए वह भगवान को प्यारा हो गया ! उधर राजा दशरथ शोकग्रस्त डरते डरते पानी लेकर उनके पास पहुंचा और पानी का वर्तन बिना कुछ कहे शरवन की माँ को पकडवा दिया, लेकिन वे तो गंध से ही पहिचान गए थे कि यह शरवन न होकर कोई और ही है ! माँ ने कहा, "बेटा शरवन तो कहता क्यों नहीं है?" लेकिन राजा दशरथ चुप ही रहे, कुछ नहीं बोले, गला रुंध गया था, आँखों में आंसू बहने लगे थे ! बड़ी मुश्किल से बोल पाए पहले पानी पीकर प्यास बुझा लो ! इतना सुनते शरवन के पिता बोले, "बता तू कौन है? हमारा शरवन कहाँ है ? कहीं तूने उसे मार तो नहीं दिया !" ? आखिर राजा दशरथ ने अपना अफाराध स्वीकार कर लिया और दोनों को अपने साथ अयोध्या चलने को कहा ! सुनते ही दोनों शरवन के माँ पिता जी शोक में शरवन शरवन करते हुए स्वर्ग सिधार गए ! लेकिन जाने से पहले राजा दशरथ को श्राप दे गए थे "कि जैसे पुत्र बियोग में हम छट फटाते हुए मृत्यु की गोद में जा रहे हैं वैसे ही तुम भी पुत्रों के वियोग में तड़प तड़प कर मरोगे " ! भगवान फिर अपने वर्तमान में आ गए ! आज उन्होंने यमराज को विशेष वार्ता के लिए बुलाया था ! उन्होंने लक्ष्मण को आदेश दिया कि जब वे यमराज के साथ मंत्रणा कर रहे हों तो किसी को भी अन्दर मत आने देना ! यमराज आए और भगवान राम के साथ गुप्त मंत्रणा करने लग गए ! इसी समय उस समय के सबसे क्रोधी ऋषि दुर्वाशा वहां गेट पर आए और लक्ष्मण से द्वार खोलने को कहने लगे ! लक्ष्मण जी ने बड़ी शालीनता से भगवान राम के आदेश को ऋषि को सुना दिया ! दुर्वाषा और भी क्रिधित होकर कहने लगे "या तो जल्दी द्वार खोल दो नहीं तो मैं तुम्हे ही अपने क्रोध की अग्नि में भाष कर दूंगा ! " लक्ष्मण जी ने द्वार खोल दिए ! दुर्वाषा ऋषि क्रोध में लाल पीला होकर वहां पहुँच गया जयां राम यमराज के साथ गुप्त मंत्रणा कर रहे थे ! राम जल्दी से बाहर आए यह देखने के लिए कि लक्ष्मण ने दुर्वाषा को अन्दर कैसे आने दिया ! क्या देखते हैं लक्ष्मण कुछ ही दूरी पर अटूट समाधी लगा चुके थे, राज्याज्ञा का उलंघन करने पर उन्होंने स्वयं ही दंड स्वरूप इस शरीर का ही त्याग कर दिया ! भगवान राम भी दुखी हो कर शरयु के किनार किनारे वट वृक्ष की छाया में नदी के जल में उतरे और वहीं जल समाधी ले ली ! यह स्थान गुप्तार घाट के नाम से जाना जाता है ! यहीं पर एक छोटा सा मंदिर है जहाँ भगवान राम की चरण पादुका सुरक्षित रखी हुई हैं ! इस घाट पर बड़ी संख्या में लोग स्नान करके तीर्थ जल स्नान का लाभ उठाते हैं ! ये थी श्री रामचंद्र भगवान की कथा ! जय श्री राम !!

सोमवार, 27 सितंबर 2010

रामायण के रहस्य (छटा भाग )

अयोध्या में रामराज्य की चर्चा चारों और फ़ैल गयी है ! बड़े बड़े विद्वान, ऋषि मुनि, साधू सन्यासी बड़ी संख्या में अयोध्या में जुड़ने लगे ! भगवान् राम ने सारे राज्य में अपने ख़ास दूत फैला रखे थे ताकी वे जनता की सुख दुःख की खबर सीधे भगवान् को देते रहें ! सब कुछ ठीक चल रहा था, प्रजा खुश थी, चारों और अमन चैन था, सब ओर शांती ! प्रशासन चुस्त दुरुस्त था ! कोई गरीब नहीं था, कोई चोर डकैत नहीं था ! लेकिन ईश्वर की माया ही अजीब है ! एक दिन भगवान राम का एक दूत उनके पास आया और कहने लगा, प्रभु प्रजा सुखी है, चारों ओर शांती का साम्राज्य है, लेकिन एक राज घराने का धोबी अपनी पत्नी से झगड़ा कर रहा था और कह रहा था, मैं श्री राम जैसा नहीं हूँ की पति एक साल तक रावण की कैद में रही और फिर पत्नी रूप में स्वीकार कर ली ! भगवान् सोचने लगे, मैंने सीता की अग्नि परीक्षा तो लंका में बानर और रिक्ष सेना के सामने किया था, अयोध्या वासियों को कैसे यकीन दिलाऊं की सीता आज भी उतनी ही पवित्र है जितनी पहले थी ! वे मर्यादा पुरुषोतम श्री राम थे ! मर्यादा का पालन करना था ! उन्होंने लक्ष्मण को बुलाया और उन्हें आदेश दिया कि सीता जी को घूमाने के बहाने जंगल में ले जाओ और उन्हें जंगल में छोड़ कर वापिस लौट आओ ! यह आदेश सुनकर लक्ष्मण जी की हालत कितनी दयनीय हो गयी होगी, वे अन्दर के आंसुओं से कितना रोये होंगे ! वे १४ साल तक भगवान राम और माता जानकी के साथ बन में रहे और इन १४ सालों में एक दिन भी सोये नहीं, केवल राम सीता जी की सुरक्षा के लिए और आज एक राजा की आज्ञा से निरपराध माता सीता को जंगल में अकेला छोड़ कर आने का आदेश हुआ है ! उनको याद आत़ा है कि जब मेघनाथ मारा जाता है और उसकी पत्नी अपने पति का पार्थिव शरीर लेने भगवान राम के पास आती है तो राम, लक्ष्मण से कहते हैं, "लक्ष्मण याद करो सुलोचना तुम्हारी पुत्री है !" सुलोचना शेषनाग की कन्या है और लक्ष्मण जी शेषनाग के ही अवतार हैं ! उसी पुत्री के सुहाग को उजाड़ दिया, क्यों, केवल सीता माता को रावण की कैद से छुड़ाने के लिए !
जी को कड़ा करना पड़ा, राज्याज्ञा का पालन करना पड़ा ! लक्ष्मण माता सीता को वन देवी के सुपुर्द करके वापिस अयोध्या लौट आए ! वहां जंगल में सीता जी को महर्षि बाल्मिकी जी के दर्शन हुए वे उन्हें अपने आश्रम में ले गए ! वहीं लब-कुश दो भाइयों का जन्म हुआ ! भगवान् राम ने अश्वमेध यज्ञ किया और अश्वमेध यज्ञ के घोड़े को इन दोनों भाइयों ने अपने आश्रम के पास ही बाँध दिया ! अश्व को छुड़ाने आए लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न तथा हनुमान जी भी घायल हो गए ! तब स्वयं भगवान राम वहां आते हैं उन वीर बालकों को देखने के लिए ! इसी बीच सीता जी को खबर हो गयी कि 'लब-कुश ने भगवान राम के अश्वमेध यज्ञ के घोड़े को बाँध रखा है, पूरी सेना उन दो बालकों से घायल हो चुकी है, अब स्वयं भगवान राम उन बालकों से युद्ध करने आए हैं' ! सीता जी वहां पर आती हैं, भगवान राम के दर्शन करने के बाद दोनों बेटों को (लब-कुश) राम को सौंप देती हैं और स्वयं धरती माँ की गोद में समा जाती हैं ! बच्चो के पास जब माँ थी तो पिता जी नहीं थे, पिता जी मिले तो माँ सदा के लिए छोड़ कर चली गयी ! जग जननी सीता माँ, मर्यादा पुरुषोतम श्री राम की धर्म पत्नी, 'कौन सा सुख भोगा उन्होंने इस धरती पर आकर !
( अगले भाग में जारी )

रविवार, 26 सितंबर 2010

अमेरिकन वनाम भारती

एक अमेरिकेन ने अपने इकलौते बेटे को इन्जिनीरिंग में पी एच डी करवा दी और उससे बोला, "my dear son, I have done my duty and now you are free to start your new life. Herein after neither I have to give you any type of help nor I will ask for it." His son requested for some financial help, which his father refused to oblige. अब आप जरा गौर फरमाएं अपने भारतीय डैडी और उनके तीन संतानों में से सबसे बड़े बेटे के बीच की वार्ता जिसको उन्होंने पढ़ाया लिखाया, और काबिल बनाया ताकि वह आने वाले समय में एक अच्छी सर्विस करके अपना शौक तो पूरा करे ही साथ ही परिवार की जिम्मेदारी भी संभाले ! अपनी पढाई पूरी करने के बाद एक दिन वह अपने पिता जी से बोलता है, "डैड मैं नौकरी नहीं करना चाहता हूँ बल्कि अपना ही कोई व्यवसाय खोलना चाहता हूँ ! इसके लिए मुझे पैसे चाहिए ! " बाप ने कहा, "बेटे मैंने अपनी बड़ी रकम तो तेरी पढाई पर लगा दी है, बैक से लोन लिया था वह भी अभी चुकता नहीं हो पाया है ! अभी तेरे दो भाई और हैं जो अभी पढ़ रहे हैं और मुझे उनकी पढाई के लिए अब तेरी मदद की जरूरत है, मेरी मान अभी नौकरी करले, जब पैसे हो जाएंगे तो तुम फिर अपना कोई भी धंधा जो अच्छा लगे शुरू कर देना "! लड़का गुस्से में बोला, लगता है बूढा सठिया गया है, जब आप में तीन बच्चों का बोझ उठाने की सामर्थ नहीं थी तो फिर पैदा क्यों किए ! मुझे पैसे चाहिए १० दिन के अन्दर चाहे बैंक से कर्ज लो, इस मकान को बेचो, कुछ भी करो मुझे पैसो दो "! बेचारा भारती मूल का आदमी, पच्चपन साल का आज भी कठीन मेहनत कर रहा है, ओवर टाईम भी काम करता है, शरीर काफी जर्जर हो गया है और लगता है की ७० पार कर गया है ! अब वह अपने देश भारत को वापिस जाना चाहता है लेकिन वहां की प्रोपर्टी भी रिश्तेदारों ने हड़प ली है ! पैसे इतना हो नहीं पा रहा है की लड़का अपना बिजिनिस शुरू कर सके और लड़का है की कोई अन्य काम करने को तैयार ही नहीं है ! अब बाप क्या करे, रोज हारे थके घर आत़ा है और बेटे के जहरीले वाणों से घायल होता रहता है !

शनिवार, 25 सितंबर 2010

रामायण के रहस्य (पांचवां भाग )

युद्ध भूमि में रावण के दशों शिर और बीसों भुजाएं कट कट कर धरती पर गिर गए ! फिर पापों से भरा शरीर भी आखिर पृश्वी पर आ गिरा ! कितनी भयानक घोर गर्जना हुई होगी, पूरी लंका तो हिल ही गयी होगी ! लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ ! तीनों लोको के नाथ भगवान् राम वहां लंका में खड़े थे, और उनकी पूरी बानर और रिक्ष सेना थी, फिर एक मात्र रावण के भारी भरकम शरीर के गिरने से धरती कैसे हिला सकती थी ! रावण के साथ ही रावण के ज़िंदा ही स्वर्ग जाने स्वप्न भी बिखर गए ! उसके स्वर्ग जाने के लिए ९९ सीढियां भी उसके गिरने के साथ ही गिर गयी ! सारे गृह सारे देवता जो उसकी कैद में थे मुक्त हो गए ! शनिश्चर जैसे ग्रहों को हनुमान जी ने पहले ही छुडा लिया था ! कहते हैं जब हनुमान जी ने लंका में आग लगाई थी, और वे एक सिरे से दूसरे सिरे तक जा रहे थे, तो उनकी नजर शनी देव पर पड़ गयी ! वे एक कोठरी में बंधे पड़े थे ! हनुमान जी ने उन्हें बंधन मुक्त किया ! मुक्त होने पर उन्होंने हनुमान जी के बल बुद्धी की भी परिक्षा ली और जब उन्हें यकीन हो गया कि वव सचमुच में भगवान रामचंद्र जी के दूत हनुमान जी हैं तो उन्होंने हनुमान जी से कहा कि "इस पृश्वी पर जो भी आपका भक्त होगा उसे मैं अपनी कुदृष्टि से दूर ही रखूंगा, उसे कभी कोइ कष्ट नहीं दूंगा " ! इस तरह शनिवार को भी मदिरों में हनुमान चालीसा का पाठ होता है तथा आरती गाई जाती है ! लंका का राज विभीषण को देकर भगवान् रामचंद्र जी, लक्ष्मण, सीता जी, सुग्रीब, अंगद, जामवंत और हनुमान जी को साथ लेकर पुष्प विमान से अयोश्या के लिए चल पड़े ! जिस शिला खंड को हनुमान जी संजीवनी वती के साथ हिमालय से उठाकर लाए थे उसे भगवान राम ने वृन्दावन में उतार दिया था और उसी पर्वत को द्वापर में कृष्ण भगवान ने अपनी उंगली पर उठाकर सारे गोकुल निवासियों को इंद्र के प्रकोप से बचाया था ! वही पर्वत गोवर्धन पर्वत के नाम से जाना जाता है ! अयोध्या आकर भगवान राम का राज्याभिषेक किया गया ! उस दिन पूरी अयोध्या को दीपों की माला से सजाया गया था ! प्रजा सुखी हो गयी ! चारों ओर अमन चैन सुख शांती का माहोल था ! कोई गरीब, दुखी, रोगी, भूखा भिखारी नहीं था ! भगवान ने जनता की फ़रियाद सुनने के लिए अपने महल के बाहर न्याय घंटी लगा रखी थी, न्याय पाने के लिए कोई भी आकर इस को बजा देता था और उसकी फ़रियाद सूनी जाती थी ! सुनते हैं एक बार एक कुते ने यह घंटी बजा दी ! ये वो ज़माना था जब कि जानवर भी इंसान की भाषा बोलते थे ! भगवान ने उससे पूछा कि उसे क्या दुःख है तो उसने आगे के दोनों पावों को उठाकर पंजे मिला कर नमस्कार मुद्रा बनाकर कहा, "भगवन आज मैं सुबह सुबह रास्ते के किनारे लेता था कि एक ब्राह्मण ने आकर मुझे लाठी मार दी " ! भगवान राम ने उसी समय ब्राह्मण को बुलवाया और उसे कुते को मारने का कारण पूछा ! ब्राह्मण ने कहा "हे राम मै सुबह सुबह सरयू नदी से नहा कर आ रहा था ! अँधेरे में मुझे नजर नहीं आया और मेरा पाँव इस से टकरा गया, इस तरह मैं अशुद्ध हो गया और मुझे फिर शुद्ध होने के लिए सरयू नदी में नहाने के लिए जाना पड़ा ! इस लिए मैंने इसे डंडा मारा "! भगवान ने कहा, "ब्राह्मण देवता कसूर तो आपने किया है एक निरपराध को आपने डंडा मारा है, आपको सजा तो मिलेगी" ! बीच में कुता बोला भगवन गुस्ताखी माफ़ हो, ब्राह्मण देवता को क्या सजा मिलनी चाहिए, क्या मैं कह दूं ? भगवान ने कहा, "कहो "! कुते ने कहा , "प्रभु इन्हे आप अपने मंदिर के पुजारी बना दें "! और भगवान राम ने उस ब्राह्मण को अपनेकुल मंदिर का पुजारी नियुक्त कर दिया ! कुते के रिश्तेदार इकट्ठे हो कर उसका मजाक उड़ाने लगे, "अबे ये कोई सजा नहीं दी गयी बल्की ब्राह्मण को तुम्हे डंडा मारने का इनाम दिया गया है "! कुते ने कहा "नहीं बन्दों यह बात नहीं है, आसल में बात यह है कि पिछले जमाने में मैं भी मंदिर का पुजारी था और स्वयं देख लो अब क्या हूँ "! सारे कुते प्रशन्न होकर नाचने लगे !