मंगलवार, 28 सितंबर 2010

रामायण के रहस्य (सातवाँ भाग)

भगवान राम अपने निजी कक्ष में बैठे हुए हैं, सोचते हैं धरती पर आने का काम पूरा हो गया है ! रघु कुल परिवार में पैदा हुआ ! "रघुकुल रीति सदा चली आई, प्राण जांए पर बचन न जाईं " ! पिता जी ने माता केकई को कभी असुरों के साथ संग्राम करते उनके द्वारा, पिता जी की जान बचाने लिए, किये गए चमत्कारिक उपाय और सच्ची क्षत्राणी के जौहर से खुश होकर दो वरदान दिए थे ! माता केकई ने जब महाराजा दशरथ के रथ की धुरी की कील निकल गयी थी और रथ कभी भी उलट सकता था और महाराजा की मृत्यु भी हो सकती थी, अपनी उंगली उस धुरी के अन्दर डाल दी और तक तक उंगली उस धुरी पर रखी जब तक सारे असुरों को महाराजा दशरथ ने यमपुरी नहीं पहुँच दिया ! यदपि रानी केकई की उंगली काफी जख्मी हो गयी थी लेकिन महाराजा दशरथ की जान ही नहीं बची थी बल्की असुरों पर विजय भी मिली थी ! इसी लिए वो दो वरदान रानी केकई को मिले थे ! भगवान राम को राज तिलक करने का दिन आया, लेकिन ऐन मौके पर रानी केकई ने महाराजा दशरथ से अपने दो वरदान पूरे करने को कहा, एक से राम को १४ साल का वनवास और दूसरे से भरत को राजसिंघासन ! अब राजा अपने वचनों से हट भी नहीं सकते थे और राम से दूर भी नहीं रह सकते थे ! राजा दशरथ को याद आई अपनी अंधी बहिन और अंधा बहनोई ! राजा दशरथ की एक ही बहिन थी और वह भी अंधी ! आखिर एक अंधे से ही उसकी शादी करके उन्हें सदा के लिए विदा कर दिया गया था ! न वे ही आए और न राजा दशरथ ही ने उन्हें कभी याद किया ! और एक दिन जब राजा दशरथ जंगल में आखेट खेलने गए हुए थे, उन्हें एक चश्मे से कुछ ऐसी आवाजें आ रही थी जैसे कोई हिरन पानी पी रहा हो ! वे शब्द भेदी वाण चलाने में माहीर थे ! उन्होंने चश्मे की तरफ गद गद शब्द पर वाण चला दिया ! वाण चश्मे पर पानी भरते हुए शरवन कुमार के जा लगा ! राजा दशरथ जैसे ही चश्मे पर पहुंचे और जा कर क्या देखते हैं कि उनके वाण से एक निर्दोष बालक की ह्त्या हो गयी है ! बालक शरवन कुमार अपने बूढ़े, अंधे माँ बाप को तीर्थ स्थानों की यात्रा करवाने के लिए ले जा रहा था ! यहाँ चश्मे के पास आकर माँ ने कहा, "बेटा शरवन बड़े जोर की प्यास लगी है, सामने चश्मे से पानी भर कर ले आ " ! वह अपने प्यासे माँ बाप को पानी पिलाने के लिए चश्मे पर पानी भर रहा था ! मरते हुए बालक ने रजा दशरथ से कहा "महाराज यह पानी मेरे प्यासे माँ बाप को पिला देना और मेरी मृत्यु के बारे में उन्हें कुछ न बताना ", यह कहते हुए वह भगवान को प्यारा हो गया ! उधर राजा दशरथ शोकग्रस्त डरते डरते पानी लेकर उनके पास पहुंचा और पानी का वर्तन बिना कुछ कहे शरवन की माँ को पकडवा दिया, लेकिन वे तो गंध से ही पहिचान गए थे कि यह शरवन न होकर कोई और ही है ! माँ ने कहा, "बेटा शरवन तो कहता क्यों नहीं है?" लेकिन राजा दशरथ चुप ही रहे, कुछ नहीं बोले, गला रुंध गया था, आँखों में आंसू बहने लगे थे ! बड़ी मुश्किल से बोल पाए पहले पानी पीकर प्यास बुझा लो ! इतना सुनते शरवन के पिता बोले, "बता तू कौन है? हमारा शरवन कहाँ है ? कहीं तूने उसे मार तो नहीं दिया !" ? आखिर राजा दशरथ ने अपना अफाराध स्वीकार कर लिया और दोनों को अपने साथ अयोध्या चलने को कहा ! सुनते ही दोनों शरवन के माँ पिता जी शोक में शरवन शरवन करते हुए स्वर्ग सिधार गए ! लेकिन जाने से पहले राजा दशरथ को श्राप दे गए थे "कि जैसे पुत्र बियोग में हम छट फटाते हुए मृत्यु की गोद में जा रहे हैं वैसे ही तुम भी पुत्रों के वियोग में तड़प तड़प कर मरोगे " ! भगवान फिर अपने वर्तमान में आ गए ! आज उन्होंने यमराज को विशेष वार्ता के लिए बुलाया था ! उन्होंने लक्ष्मण को आदेश दिया कि जब वे यमराज के साथ मंत्रणा कर रहे हों तो किसी को भी अन्दर मत आने देना ! यमराज आए और भगवान राम के साथ गुप्त मंत्रणा करने लग गए ! इसी समय उस समय के सबसे क्रोधी ऋषि दुर्वाशा वहां गेट पर आए और लक्ष्मण से द्वार खोलने को कहने लगे ! लक्ष्मण जी ने बड़ी शालीनता से भगवान राम के आदेश को ऋषि को सुना दिया ! दुर्वाषा और भी क्रिधित होकर कहने लगे "या तो जल्दी द्वार खोल दो नहीं तो मैं तुम्हे ही अपने क्रोध की अग्नि में भाष कर दूंगा ! " लक्ष्मण जी ने द्वार खोल दिए ! दुर्वाषा ऋषि क्रोध में लाल पीला होकर वहां पहुँच गया जयां राम यमराज के साथ गुप्त मंत्रणा कर रहे थे ! राम जल्दी से बाहर आए यह देखने के लिए कि लक्ष्मण ने दुर्वाषा को अन्दर कैसे आने दिया ! क्या देखते हैं लक्ष्मण कुछ ही दूरी पर अटूट समाधी लगा चुके थे, राज्याज्ञा का उलंघन करने पर उन्होंने स्वयं ही दंड स्वरूप इस शरीर का ही त्याग कर दिया ! भगवान राम भी दुखी हो कर शरयु के किनार किनारे वट वृक्ष की छाया में नदी के जल में उतरे और वहीं जल समाधी ले ली ! यह स्थान गुप्तार घाट के नाम से जाना जाता है ! यहीं पर एक छोटा सा मंदिर है जहाँ भगवान राम की चरण पादुका सुरक्षित रखी हुई हैं ! इस घाट पर बड़ी संख्या में लोग स्नान करके तीर्थ जल स्नान का लाभ उठाते हैं ! ये थी श्री रामचंद्र भगवान की कथा ! जय श्री राम !!

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