सोमवार, 27 सितंबर 2010

रामायण के रहस्य (छटा भाग )

अयोध्या में रामराज्य की चर्चा चारों और फ़ैल गयी है ! बड़े बड़े विद्वान, ऋषि मुनि, साधू सन्यासी बड़ी संख्या में अयोध्या में जुड़ने लगे ! भगवान् राम ने सारे राज्य में अपने ख़ास दूत फैला रखे थे ताकी वे जनता की सुख दुःख की खबर सीधे भगवान् को देते रहें ! सब कुछ ठीक चल रहा था, प्रजा खुश थी, चारों और अमन चैन था, सब ओर शांती ! प्रशासन चुस्त दुरुस्त था ! कोई गरीब नहीं था, कोई चोर डकैत नहीं था ! लेकिन ईश्वर की माया ही अजीब है ! एक दिन भगवान राम का एक दूत उनके पास आया और कहने लगा, प्रभु प्रजा सुखी है, चारों ओर शांती का साम्राज्य है, लेकिन एक राज घराने का धोबी अपनी पत्नी से झगड़ा कर रहा था और कह रहा था, मैं श्री राम जैसा नहीं हूँ की पति एक साल तक रावण की कैद में रही और फिर पत्नी रूप में स्वीकार कर ली ! भगवान् सोचने लगे, मैंने सीता की अग्नि परीक्षा तो लंका में बानर और रिक्ष सेना के सामने किया था, अयोध्या वासियों को कैसे यकीन दिलाऊं की सीता आज भी उतनी ही पवित्र है जितनी पहले थी ! वे मर्यादा पुरुषोतम श्री राम थे ! मर्यादा का पालन करना था ! उन्होंने लक्ष्मण को बुलाया और उन्हें आदेश दिया कि सीता जी को घूमाने के बहाने जंगल में ले जाओ और उन्हें जंगल में छोड़ कर वापिस लौट आओ ! यह आदेश सुनकर लक्ष्मण जी की हालत कितनी दयनीय हो गयी होगी, वे अन्दर के आंसुओं से कितना रोये होंगे ! वे १४ साल तक भगवान राम और माता जानकी के साथ बन में रहे और इन १४ सालों में एक दिन भी सोये नहीं, केवल राम सीता जी की सुरक्षा के लिए और आज एक राजा की आज्ञा से निरपराध माता सीता को जंगल में अकेला छोड़ कर आने का आदेश हुआ है ! उनको याद आत़ा है कि जब मेघनाथ मारा जाता है और उसकी पत्नी अपने पति का पार्थिव शरीर लेने भगवान राम के पास आती है तो राम, लक्ष्मण से कहते हैं, "लक्ष्मण याद करो सुलोचना तुम्हारी पुत्री है !" सुलोचना शेषनाग की कन्या है और लक्ष्मण जी शेषनाग के ही अवतार हैं ! उसी पुत्री के सुहाग को उजाड़ दिया, क्यों, केवल सीता माता को रावण की कैद से छुड़ाने के लिए !
जी को कड़ा करना पड़ा, राज्याज्ञा का पालन करना पड़ा ! लक्ष्मण माता सीता को वन देवी के सुपुर्द करके वापिस अयोध्या लौट आए ! वहां जंगल में सीता जी को महर्षि बाल्मिकी जी के दर्शन हुए वे उन्हें अपने आश्रम में ले गए ! वहीं लब-कुश दो भाइयों का जन्म हुआ ! भगवान् राम ने अश्वमेध यज्ञ किया और अश्वमेध यज्ञ के घोड़े को इन दोनों भाइयों ने अपने आश्रम के पास ही बाँध दिया ! अश्व को छुड़ाने आए लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न तथा हनुमान जी भी घायल हो गए ! तब स्वयं भगवान राम वहां आते हैं उन वीर बालकों को देखने के लिए ! इसी बीच सीता जी को खबर हो गयी कि 'लब-कुश ने भगवान राम के अश्वमेध यज्ञ के घोड़े को बाँध रखा है, पूरी सेना उन दो बालकों से घायल हो चुकी है, अब स्वयं भगवान राम उन बालकों से युद्ध करने आए हैं' ! सीता जी वहां पर आती हैं, भगवान राम के दर्शन करने के बाद दोनों बेटों को (लब-कुश) राम को सौंप देती हैं और स्वयं धरती माँ की गोद में समा जाती हैं ! बच्चो के पास जब माँ थी तो पिता जी नहीं थे, पिता जी मिले तो माँ सदा के लिए छोड़ कर चली गयी ! जग जननी सीता माँ, मर्यादा पुरुषोतम श्री राम की धर्म पत्नी, 'कौन सा सुख भोगा उन्होंने इस धरती पर आकर !
( अगले भाग में जारी )

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