शनिवार, 25 सितंबर 2010

रामायण के रहस्य (पांचवां भाग )

युद्ध भूमि में रावण के दशों शिर और बीसों भुजाएं कट कट कर धरती पर गिर गए ! फिर पापों से भरा शरीर भी आखिर पृश्वी पर आ गिरा ! कितनी भयानक घोर गर्जना हुई होगी, पूरी लंका तो हिल ही गयी होगी ! लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ ! तीनों लोको के नाथ भगवान् राम वहां लंका में खड़े थे, और उनकी पूरी बानर और रिक्ष सेना थी, फिर एक मात्र रावण के भारी भरकम शरीर के गिरने से धरती कैसे हिला सकती थी ! रावण के साथ ही रावण के ज़िंदा ही स्वर्ग जाने स्वप्न भी बिखर गए ! उसके स्वर्ग जाने के लिए ९९ सीढियां भी उसके गिरने के साथ ही गिर गयी ! सारे गृह सारे देवता जो उसकी कैद में थे मुक्त हो गए ! शनिश्चर जैसे ग्रहों को हनुमान जी ने पहले ही छुडा लिया था ! कहते हैं जब हनुमान जी ने लंका में आग लगाई थी, और वे एक सिरे से दूसरे सिरे तक जा रहे थे, तो उनकी नजर शनी देव पर पड़ गयी ! वे एक कोठरी में बंधे पड़े थे ! हनुमान जी ने उन्हें बंधन मुक्त किया ! मुक्त होने पर उन्होंने हनुमान जी के बल बुद्धी की भी परिक्षा ली और जब उन्हें यकीन हो गया कि वव सचमुच में भगवान रामचंद्र जी के दूत हनुमान जी हैं तो उन्होंने हनुमान जी से कहा कि "इस पृश्वी पर जो भी आपका भक्त होगा उसे मैं अपनी कुदृष्टि से दूर ही रखूंगा, उसे कभी कोइ कष्ट नहीं दूंगा " ! इस तरह शनिवार को भी मदिरों में हनुमान चालीसा का पाठ होता है तथा आरती गाई जाती है ! लंका का राज विभीषण को देकर भगवान् रामचंद्र जी, लक्ष्मण, सीता जी, सुग्रीब, अंगद, जामवंत और हनुमान जी को साथ लेकर पुष्प विमान से अयोश्या के लिए चल पड़े ! जिस शिला खंड को हनुमान जी संजीवनी वती के साथ हिमालय से उठाकर लाए थे उसे भगवान राम ने वृन्दावन में उतार दिया था और उसी पर्वत को द्वापर में कृष्ण भगवान ने अपनी उंगली पर उठाकर सारे गोकुल निवासियों को इंद्र के प्रकोप से बचाया था ! वही पर्वत गोवर्धन पर्वत के नाम से जाना जाता है ! अयोध्या आकर भगवान राम का राज्याभिषेक किया गया ! उस दिन पूरी अयोध्या को दीपों की माला से सजाया गया था ! प्रजा सुखी हो गयी ! चारों ओर अमन चैन सुख शांती का माहोल था ! कोई गरीब, दुखी, रोगी, भूखा भिखारी नहीं था ! भगवान ने जनता की फ़रियाद सुनने के लिए अपने महल के बाहर न्याय घंटी लगा रखी थी, न्याय पाने के लिए कोई भी आकर इस को बजा देता था और उसकी फ़रियाद सूनी जाती थी ! सुनते हैं एक बार एक कुते ने यह घंटी बजा दी ! ये वो ज़माना था जब कि जानवर भी इंसान की भाषा बोलते थे ! भगवान ने उससे पूछा कि उसे क्या दुःख है तो उसने आगे के दोनों पावों को उठाकर पंजे मिला कर नमस्कार मुद्रा बनाकर कहा, "भगवन आज मैं सुबह सुबह रास्ते के किनारे लेता था कि एक ब्राह्मण ने आकर मुझे लाठी मार दी " ! भगवान राम ने उसी समय ब्राह्मण को बुलवाया और उसे कुते को मारने का कारण पूछा ! ब्राह्मण ने कहा "हे राम मै सुबह सुबह सरयू नदी से नहा कर आ रहा था ! अँधेरे में मुझे नजर नहीं आया और मेरा पाँव इस से टकरा गया, इस तरह मैं अशुद्ध हो गया और मुझे फिर शुद्ध होने के लिए सरयू नदी में नहाने के लिए जाना पड़ा ! इस लिए मैंने इसे डंडा मारा "! भगवान ने कहा, "ब्राह्मण देवता कसूर तो आपने किया है एक निरपराध को आपने डंडा मारा है, आपको सजा तो मिलेगी" ! बीच में कुता बोला भगवन गुस्ताखी माफ़ हो, ब्राह्मण देवता को क्या सजा मिलनी चाहिए, क्या मैं कह दूं ? भगवान ने कहा, "कहो "! कुते ने कहा , "प्रभु इन्हे आप अपने मंदिर के पुजारी बना दें "! और भगवान राम ने उस ब्राह्मण को अपनेकुल मंदिर का पुजारी नियुक्त कर दिया ! कुते के रिश्तेदार इकट्ठे हो कर उसका मजाक उड़ाने लगे, "अबे ये कोई सजा नहीं दी गयी बल्की ब्राह्मण को तुम्हे डंडा मारने का इनाम दिया गया है "! कुते ने कहा "नहीं बन्दों यह बात नहीं है, आसल में बात यह है कि पिछले जमाने में मैं भी मंदिर का पुजारी था और स्वयं देख लो अब क्या हूँ "! सारे कुते प्रशन्न होकर नाचने लगे !

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