यहाँ भी गंगा के इस बदले हुए रूप को देखकर नारद जी को कुछ बेचैनी जरूर हुई पर हरी इच्छा कहते हुए वे आगे श्रीनगर पहुंचे ! अलकनंदा के किनारे बसा श्रीनगर कभी गढ़वाल के राजाओं की राजधानी हुआ करती थी ! वैसे अलकनंदा की बाढ़ ने इस रमणीक पुरानों में वर्णित श्रीनगर को कही बार उजाड़ा और मनुष्यों ने भी कुदरत से बार बार लोहा लेकर इसके अस्तित्व को मिटने नहीं दिया ! १८०३-०४ ई० में गोरखों ने अटैक करके लूट पाट मचा कर इसको फिर उजाड़ दिया था ! लेकिन अलकनंदा अठखेलियाँ करती हुयी, पर्वत श्रृंखलाएं , पेड़ पौधों की विभिन्न किस्मे, रंग विरंगे फूलों की चारों ओर बिखरी खुशबू, हरे भरे सीढीनुमा खेतों ने इस पहाडी पर्वत को कुदरत द्वारा दी गयी सौगात से आज भी सजा धजा कर खूबसूरती का ताज पहिना रखा है! नारद जी कुछ देर के लिए अलकनंदा तट पर भगवान की स्तुति में खो से गए थे ! आज यहाँ पर गढ़वाल यूनिवर्सिटी है, स्कूल हैं कॉलेज हैं, खेल के मैदान डाक खाना तार घर हैं ! यहाँ से चलकर नारद जी रुद्रप्रयाग आए, अभी तक वे अदृश्य होकर अपना सफ़र कर रहे थे, लोगों की बातें सुन रहे थे कुदरत की लीला के साथ मनुष्य निर्मित नदियों के पुल, नदियों पर बंधे बाँध, सड़कें, नदी के कुदरती बहाव को रोक कर पहाड़ों के अन्दर सुरंग बनाकर नदी के रुख को बदलने का भागीरथ प्रयत्न ! कही स्थानों पर चट्टानों के खिसकने से गाँवों की तवाही भी नारद जी की नज़रों से नहीं बच पायी ! रुद्रप्रयाग संगम मंदाकिनी और अलकनंदा का ! एक नदी मंदाकिनी केदारनाथ के शिव जी के चरणों को धोती हुई, और उधर अलकनंदा श्री बद्रीनाथ के चरण स्पर्श करती हुई पहाड़ों की चट्टानों से गरजना करती हुई, इस पवित्र स्थान पर आकर मिलती है ! समुद्र तल से २००० फीट की ऊंचाई पर बसा यह कस्बा आधुनिक साज सज्जा से युक्त धर्मशालाए और आरामदायक होटलों के कारण प्रयाटकों का आकर्षक केंद्र बिंदु है ! यहाँ से एक सड़क केदारनाथ के लिए और दूसरी बद्रीनाथ के लिए चली जाती है ! यहाँ से पंडों का राज शुरू हो जाता है, सारे धर्मशालाएं, होटल्स, लाज, आलीशान कोठियां इन पंडों की ही निजी सम्पति है ! इलाके के सबसे रईसों में है इन पंडों की गिनती ! नारद जी रूद्र पयाग से तिल वाडा अगस्त मुनि पहुंचे ! गुप्तकाशी में शिव भगवान के दर्शन किए ! किवदंती के मुताबिक़ पांडवों से रोष्ट होकर शिव जी इसी स्थान पर गुप्त हुए थे इसीलिये इसका नाम गुप्त काशी पड़ा ! फिर नारायण कोटि होते हुए, फाटा, सोनप्रयाग और पहुंचे गौरी कुंड ! गौरी कुंड मंदाकिनी नदी के तट पर बसा हुआ कस्बा है जो गर्मियों में गुलजार रहता है और सर्दियों में बर्फ से ढक जाता है, नवम्बर से अप्रेल तक मानव रहित सफ़ेद चद्दर के आवरण में लिपटा चुप चाप सूरज की तेज किरणों का इंतज़ार करता रहता है ! नारद जी ने गौरी कुंड के तप्त जल में स्नान किया, एक रात यहाँ एक लाज में विश्राम किया ! गौरी की पूजा अर्चना की प्रशाद लिया ! वहां बहुत बड़ी संख्या में लोग केदार-बद्री दर्शनों की लालसा लिए दूर दराज के इलाकों से आये थे ! इनमें अमीर भी थे जो फाटा से हेलीकाफ्टर से सीधे केदारनाथ जा रहे थे और हेलीकाफ्टर से ही वापिस फाटा आरहे थे ! कुछ मध्यवर्ग के लोग थे तो कुछ गरीब थे ! कुछ अपाहिज भी थे फिर भी दर्शन करने आये थे ! कुछ लम्बी बीमारी से ग्रस्त रोगी भी थे जिन्हें धर्माचारियों ने, ज्योतिषियों ने इस किस्म की बीमारी का इलाज केवल केदारनाथ-बद्रीनाथ यात्रा बतलाया था, वे अपने बेटे बहु या रिश्ते दारों के साथ आये थे ! कुछ लोग खच्चरों में जा रहे थे तो कुछ पैदल १४ मील की कठीन चढ़ाई चढ़ कर केदारधाम पहुँच रहे थे कुछ दर्हन करके वापिस आरहे थे ! नारद जी भी इन पैदल यात्रियों के दल में सामिल होकर जय केदार जय बद्रीनाथ कहते हुए चढ़ाई चढ़ रहे थे और इस विभिन्न श्रेणी के लोगों के बीच सफ़र का आनंद ले रहे थे ! यहाँ कोइ किसी की जातित धर्म नहीं पूछ रहा था, न किसी की अफसर साही, नौकरशाही, नेता मंत्री या घसियारा, मोची, धोबी का ही कोइ भेद कर रहा था, एक स्वर और एक आवाज गूंज रहा था जैकारा का ! विभिन्नताओं में एकता का जीता जागता प्रमाण ! आखीर नारद जी इस दल बलके साथ केदारनाथ पहुँच गए ! वहां आगे मिले उतने ही पण्डे जितने दर्नार्थी थे, वे दर्शन करने आए लोगों से उनके जिला, प्रदेश और निवास स्थान, पूछ कर अपने जजमानों को अपने साथ अपनी धर्म शालाओं, होटलों में ले जा रहे थे ! नारद जी भी एक सज्जा सजाया होटल में एक रईस के साथ ही चले गए ! क्रमशः
मंगलवार, 5 जुलाई 2011
सोमवार, 4 जुलाई 2011
नारद जी धरती पर आए - चौथी किस्त
लगता है इन सैनिकों में जो वरिष्ट सैनिक बैठे थे वे एक सूबेदार रैंक के थे ! सैनिक जीवन में उनहोंने जिन्दगी का हर पहलू देखा था ! उनहोंने, बिल्यू स्टार औप्रेसन, कारगिल वार और ७१ की लड़ाई में भी हिस्सा लिया था, उनहोंने सैनिकों की तड़पती हुई लाशें भी देखी थी, कही बार मौत को लौटते हुए भी देखा था !लोंगेवाला में एक गोला उनसे कुछ ही दूरी पर गिरा था लेकिन फटा नहीं, और उनके सारे साथी सुरक्षित बच गए थे ! उस समय उनकी सर्विस केवल एक साल की थी, ट्रेनिंग पूरी होते ही वे यहां मोर्चे पर पोस्ट कर दिए गए थे ! वे उस युद्ध के बारे में बताते हैं की, " भारतीय सेना की केवल एक कंपनी यहाँ पर तैनात थी! यद्यपि हमारा पूरा डिविजन किशनगढ़ इलाके में तैनात था ! पाकिस्तान अपने टैंकों से लोगोंवाला पर अटैक कर देगा इसकी संभावना कम थी, लेकिन पाकिस्तान ने गहरे नालों में अपने टैंकों को उतार कर असंभव को संभव कर दिया और इन दुर्गम घाटियों में अटैक का नया रास्ता ढूंढ लिया ! एक बार तो लगा था की टैंकों की इस चौतरफा बमबारी से कोई भी ज़िंदा नहीं बच पाएगा लेकिन तभी हमारी वायुसेना के फाईटरों ने गोलाबारी की और पाकिस्तानी डिविजन के सारे टैंक एक घंटे के अन्दर तोड़ डाले गए ! पाकिस्तानी डिविजन का रामगढ़ के रास्ते जैसलमेर पर अटैक करने का स्वप्ना ख़त्म कर दिया गया ! पाकिस्तान को जान माल का बहुत नुकशान हुआ ! हमारे काफी सैनिक भी वीर गति को प्राप्त हुए ! सूबेदार साहब बोले, ये सब प्रभु की कृपा थी, की हमारी रक्षा के लिए उनहोंने लड़ाकू विमान भिजवा दिए ! सैनिक की जिन्दगी का कोई भरोषा नहीं रहता, इसलिए हमारी सेना की हर बटालियन में हर धर्म के मानने वालों के लिए मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा और चर्च की व्यवस्था रहती है ताकी लड़ाई में, आतंकवादियों के खिलाफ, कुदरती आपदाओं में, बाढ़ - भूचाल जैसे कहर बरपाने वाली घड़ी में आम लोगों के बचाव में जाने से पहले उस परपिता परमात्मा का स्मरण किया जा सके ! इस ७१ की लड़ाई में हमारे अफसर, सरदार और जवान बड़ी संख्या में शहीद हुए, कही माँवों ने बेटे खोये, कही नव योवनाओं के सुहाग उजड़े, कही बच्चों के सर से बाप की छाया उठ गयी, और नेताओं ने क्या किया जीती हुई जमीन पाकिस्तान को वापिस कर दी" ! इसी समय उस कम्पार्टमेंट में दो साधू आकर दरवाजे के पास ही खड़े हो गए ! डिब्बा पैक्ड था, एक सैनिक ने दोनों साधू जो डील डौल चहरे मोहरे से साधू ही लग रहे थे, उन्हें अपनी सीट पर बिठा दिया और स्वयं खड़ा हो गया ! एक साधू दूसरे से बोला, "देखा भारतीय संस्कृति और सभ्यता, ये सैनिक देश की सुरक्षा तो करते ही हैं साथ ही मानव सेवा भी करते हैं ! इन लोगों का दिल कितना बड़ा है ! वीर सैनिकों तुम सदा अजर अमर रहोगे, आने वाले पीढी तुम्हारी वीरता, दानवीरता, शील स्वभाव, दूसरों के प्रति आदरभाव, कर्तव्य परायणता, ईमानदारी और वफादारी की मिशालें देगी ! तुमने अपनी सीट हमीं दी और देखो जगह काफी हो गयी और अब हम सब आराम से बैठ सकते हैं ! " और सचमुच में सभी लोग सीटों में एडजस्ट हो गए कोई नीचे नहीं बैठा था ! गाडी अब देहरादून स्टेसन पर रुक गयी थी ! सभी के साथ साथ नारद जी भी गाडी से बाहर आगये ! सोचा चलो पहले हरिद्वार चल कर गंगा स्नान का लाभ प्राप्त कर लें ! वे हरिद्वार हर की पैडी पर आये, देखा सारी गंगा प्रदूषित हो चुकी है, कितने कितने कार खानों की गन्दगी, लाशें राख इस पवित्र गंगा में मिलाई जा रही हैं, बहुत बड़ी मात्रा में बालू रेता नदी से बाहर ले जाया जा रहा है ! गंगा वो असली गंगा जो भागीरथ के अथक तपस्या और परिश्रम से ब्रह्मा जी के कमंडल से बाहर निकालकर शिव जी की जटा से होते हुए धरती पर उतारी गयी थी, जो कलतक पतीत पावनी गंगा जी से जानी जाती थी वो असली गंगा कहाँ खो गयी ! नारद जी ने इस गंगा के पानी को छुआ तक नहीं ! यहीं से वे ऋषिकेश होते हुए तेहरी पहुंचे !
रविवार, 3 जुलाई 2011
नारद जी धरती पर आए - तीसरा भाग
अचानक नारद जी के दिमाग में एक विचार आया की जब मैं पिछली बार पृथ्वी पर आया था तो गढ़वाल और कुमायूं की मनोहर घाटियों, नदियों और पहाड़ पर्वतों को मिलाकर यहाँ के स्थानीय निवासी एक अलग प्रदेश की मांग कर रहे थे, मुलायमसिंह नामक अत्याचारी आन्दोलनकारियों के ऊपर कहर बरपा रहे थे, चल कर देखना चाहिए की ये कुदरत की गोद में पले पर्वत वासी अपना अलग राज्य लेने में तो कामयाब हो गए लेकिन उस नए राज्य की शासन व्यवस्था कैसे चल रही है, चलकर देखना चाहिए ! वे वहां से सीधे पुराणी दिली के रेलवे स्टेशन आए, वहां वही रेल पेल ठेलम ठेल शोर शराबा, भीड़ भडाका ! एक बार तो वे भी चकरा गए, लेकिन वे तो अदृश्य होकर चल रहे थे, न टिकट का झंझट न कोई आरक्षण की जोर आजमाइस की जरूरत ! जैसे ही मंसूरी एक्सप्रेस स्टेशन पर रुकी, जनरल बोगियों में चढ़ने की होड़ लग गयी, धक्का पेली, दोनों हाथों में भारी भरकम सामान दरवाजे पर अड़ गए, न बाहर न भीतर, पीछे वाला उनके सिर के ऊपर से बोक्स, विस्तरा भीतर खिसका रहा था, कुछ मन चले पहले ही भीतर जाकर सीट घेरे बैठे थे या ऊपर की सीटों पर पैर पसार कर लेटे थे ! जिनके साथ में छोटे छोटे बच्चे थे और भारी सामान था वे कुली की मदद ले रहे थे और कुली को मुंह मागा पैसा दे रहे थे ! चोर उच्चके जेब कतरों की बहार आ रही थी और अनजान शरीफ मुसाफिरों की जेब कट रही थी ! रेलवे पुलिस, स्थानीय पुलिस दूर खड़े होकर तमाशा देख रहे थे और सिगरेट या बीडी का धुंवा उड़ा रहे थे ! बड़े लोग मंत्री, एम पी, एल एम ए सचीव तबके के अधिकारी, रसूक वाले लोग आ रहे थे और वातानुकूल प्रथम श्रेणी या द्वितीय श्रेणी वातानुकूल आरक्षण डिब्बों में जाकर आराम से बैठे थे, उनके नौकर, चपरासी, या फिर रेलवे के कर्मचारी उनके सामान निर्दिष्ट स्थानों पर जचा रहे थे ! यहाँ गरीब बहुत ही गरीब गरीबी लाइन से बहुत नीचे थे तो ऊपर वाले बहुत ही ऊंचे थे ! नारद जी देख कर हैरान थे की क्या यही आजाद भारत की असली तस्वीर है ? जहां संविधान में तो सबको समानता का अधिकार है, यह एक धर्म निरपेक्ष, प्रतान्त्रिक, लोकतांत्रिक सार्वभौमिक राज्य है ! लेकिन असल में आरक्षण है, विभाजन है, अमीरी गरीबी है, बड़ा छोटा है वह सब कुछ है जो अंग्रेज छोड़ गए थे, फर्क इतना है वे गोरी चमड़ी के शासक थे डंडे बरसाने वाले ये काली चमड़ी के शासक हैं ! नारद जी भी किसी आरक्षण डिब्बे में जाकर बैठ गए ! उसमें कुछ सैनिक बैठे थे, कोई कारगिल के ग्लेसियरों से तो कोई लेह लद्दाक, श्रीनगर, बारामुला, पूँछ घाटी से सालाना दो महीने के अवकास पर जा रहे थे ! इन्होंने पूरा डिब्बा सैनिकों के नाम से आरक्षित कर लिया था, पर भीड़ इसमें भी बड़ी थी ! एक सैनिक जो बरिष्ट लग रहा था और कन्धों में दो फूल लगाए था सबको संभाले हुए था ! एक सैनिक बोला सर जी अब और कितना खून बहाना पडेगा इस काश्मीर के लिए ! कल दश आतंकवादी आये, कैम्प में गोली बारी की दश जवान मारे गए, हमने भी मजबूरी में गोली चलाई उनके सारे आतंकी ढेर कर दिए, देखा अगले दिन राज्य सरकार और अलगाव वादी उनकी लाशों को लेकर क्या शोर शराबा मचा रहे थे ! पूरा दोष सैनिकों पर डाल रहे थे ! जानते हुए भी की वे सारे आतंकवादी पाकिस्तानी थे और आतंक फैलाने के लिए काश्मीर में घूस आये थे ! और ये केन्द्रीय सरकार, .....? वरिष्ट सैनिक बोले रहने भी दो अब इन बातों को,, काश्मीर के जहरीले बीज किसने बोये थे, देश का विभाजन किसने करवाया जो शासन पर आसीन हैं ! काश्मीर में जेहाद किसने भड़काया जनता को सब पता है लेकिन जरिया भी तो कोई नहीं है, विपक्ष भी तो वोट बैंक भुनाने के लिए अल्प संख्यक का सहारा ले रही है और देश की सुरक्षा डाव पर लगा रही है ! वो अफजल गुरु जो पूरे संसद को उड़ाने वाला था, १३ सुरक्षा कर्मी मरे थे उसमें, सांसदों को बचाने में ! उसे फांसी की सजा सुप्रीम कोर्ट से मिल गयी लेकिन वो कौन है सरकार में बैठा की उसे फांसी पर लटक वाने में अड़चन पैदा कर रहा है ! सुना है उसकी सुरक्षा और रख रखाव पर सरकार रोज करोड़ों खर्च कर रही है ! जिस देश में एक आतंक वादी की पूजा हो रही है उस देश को बचाने के लिए भगवान को फिर अवतार लेना पडेगा ! (बाकी चौथा पेज में)
नारद जी फिर धरती पर आये द्वितीय भाग
नारद जी देवेन्द्र से बातें कर ही रहे थे की समाचार मिला की धरती से एक चिंगारी बड़ी वेग से आकाश गंगा की तरफ आ रही है, इसमें बाहरी तापमान को समावेश करने की क्षमता वाला पीछे एक रेल डिब्बे जैसा बॉक्स सलग्न है जिसमें दो बन्दर बंद हैं ! धरती वाले उसे अन्तरिक्ष यान से जानते हैं ! वह पहले चंद्रमा की कक्षा में मंडराता रहा फिर सीधे मंगल ग्रह की कक्षा में पहुँच गया ! नारद जी ने सोचा चलो चल कर देखते हैं अपनी योग शक्ती के बल पर इसी यान के अन्दर प्रवेश कर देना चाहिए ! उनहोंने योग बल का प्रयोग किया और पहुँच गए मानव निर्मित अन्तरिक्ष यान के अन्दर ! वाह क्या आराम दायक वातानुकूल सभी सुख सुविधाओं से सुसज्जित, नारद जी धरती के मानवों द्वारा निर्मित की गयी इस नायाब वायुयान से बड़े प्रभावित हुए साथ ही उन्हें बड़ा आश्चर्य भी हुआ की इंसान तो जन्मता है और ज्यादा से ज्यादा ९० - १०० सालों के अन्दर इस संसार से कूच कर देता है कुछ तो अपने जवानी के प्रथम सीढी पर कदम रखने से पहले ही धरती छोड़नी पड़ती है फिर ये लोग कब इतना बड़ा काम कर देते हैं ! हजारों रोगों से रोग ग्रस्त रहतेहैं, पूरे परिवार के पालन पोषण की चिंता अलग फिर भी कुदरत से टकर
लेकर कुदरत को ही बदल देते हैं ! देवता तो अजर अमर होने के बाद भी जो सम्पति उन्हें विरासत में मिली है उसी को भी संभाल कर नहीं रख पा रहे हैं और जो भोग विलास की वस्तुवें स्वर्ग लोक निर्माण के समय देवताओं को दी गयी थी, उन में कोई भी इजाफा नहीं हुआ और इंसान ने अपने बाहुबल से, अपने दिमाग से जंगली हिंसक जानवरों को साथी बनाकर, आसमान में उड़ने वाले पक्षियों से साझेदारी करके धरती के नक़्शे को ही बदल दिया है ! तभी तो स्वर्गके देवता भी धरती पर वेश बदल बदल कर पिकनिक मनाने समय समय पर आते रहते हैं ! लेकिन जब मैं पिछली बार धरती पर गया था तब तो शानदार महल, भवन, मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा, चर्च, नदियों में भारी भरकम पुल, जंगल काट कर खेती, और कही चमत्कारी काम तो किये थे लेकिन इस प्रकार के धरती से स्वर्ग को मिलाने वाला यान पहली बार देखने को मिला ! यान में कैमरे लगे थे और वे स्वचालित थे ! फोटो खिची जा रही थी और सामने वाले स्क्रीन पर वह नजर आ रही थी और धरती पर भेजी जा रही थी ! वह यान एक महीने के अभियान पर अंतरिक्ष की सीमा में रहा और फिर जाकर धरती पर अमेरिका के नासा वेधशाला में जाकर उतर गया, नारद जी वहीं विना किसी को नजर आए विमान से उतरे और उनकी छाया इण्डिया आने वाले इयर लाइन में सवार हो गयी ! अब नारद जी दिल्ली के इन्द्रा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे से बाहर निकले, दिल्ली बदली बदली लग रही थी ! मेट्रो ट्रेन इयर पोर्ट से कनाट प्लेस केवल १७ मिनट में पहुँच गयी ! वे जय जवान ज्योति स्थल पर गए, २ मिनट तक शहीदों की आत्माओं की शांती के लिए प्रार्थना की और चले राष्ट्रपति भवन की ऑर ! अभी तक वे अपना सफ़र अदृश्य होकर ही कर रहे थे ! (तीसरा भाग जारी)
लेकर कुदरत को ही बदल देते हैं ! देवता तो अजर अमर होने के बाद भी जो सम्पति उन्हें विरासत में मिली है उसी को भी संभाल कर नहीं रख पा रहे हैं और जो भोग विलास की वस्तुवें स्वर्ग लोक निर्माण के समय देवताओं को दी गयी थी, उन में कोई भी इजाफा नहीं हुआ और इंसान ने अपने बाहुबल से, अपने दिमाग से जंगली हिंसक जानवरों को साथी बनाकर, आसमान में उड़ने वाले पक्षियों से साझेदारी करके धरती के नक़्शे को ही बदल दिया है ! तभी तो स्वर्गके देवता भी धरती पर वेश बदल बदल कर पिकनिक मनाने समय समय पर आते रहते हैं ! लेकिन जब मैं पिछली बार धरती पर गया था तब तो शानदार महल, भवन, मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा, चर्च, नदियों में भारी भरकम पुल, जंगल काट कर खेती, और कही चमत्कारी काम तो किये थे लेकिन इस प्रकार के धरती से स्वर्ग को मिलाने वाला यान पहली बार देखने को मिला ! यान में कैमरे लगे थे और वे स्वचालित थे ! फोटो खिची जा रही थी और सामने वाले स्क्रीन पर वह नजर आ रही थी और धरती पर भेजी जा रही थी ! वह यान एक महीने के अभियान पर अंतरिक्ष की सीमा में रहा और फिर जाकर धरती पर अमेरिका के नासा वेधशाला में जाकर उतर गया, नारद जी वहीं विना किसी को नजर आए विमान से उतरे और उनकी छाया इण्डिया आने वाले इयर लाइन में सवार हो गयी ! अब नारद जी दिल्ली के इन्द्रा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे से बाहर निकले, दिल्ली बदली बदली लग रही थी ! मेट्रो ट्रेन इयर पोर्ट से कनाट प्लेस केवल १७ मिनट में पहुँच गयी ! वे जय जवान ज्योति स्थल पर गए, २ मिनट तक शहीदों की आत्माओं की शांती के लिए प्रार्थना की और चले राष्ट्रपति भवन की ऑर ! अभी तक वे अपना सफ़र अदृश्य होकर ही कर रहे थे ! (तीसरा भाग जारी)
शनिवार, 2 जुलाई 2011
नारद जी फिर धरती पर आए
पिछली बार जब नारद जी विष्णु भगवान् जी से मिलने क्षीर सागर शेष शैय्या पर पहुंचे तो भगवान् जी आँखें मूंदे गहन विचारों में लींन थे ! लक्ष्मी जी उनके चरणों में बैठी उन्हें अलोट पलोट रही थी ! नारद जी को आते देखकर उनहोंने अपना सिर ढक लिया प्रणाम किया आशीर्वाद लिया और बैठने के लिए आसन दिया ! इतने में विष्णु भगवान् जी के अलसाए नेत्र भी खुल गए, "बोले कहो नारद, क्या खबर लाए हो ? इन दिनों कभी मृत्यु लोक जाना हुआ ? अगर नहीं गए तो चले जाना और वहां के ताजे समाचार लेकर आना" ! नारद जी बोले , "भगवन इस इक्कीसवीं सदी में तो पृथ्वी पर जाना नहीं हो सका लेकिन अब जल्दी ही जाउंगा और आपके आदेश का पालन करूंगा ! " कुछ इधर उधर की बातें हुई और फिर नारद जी विष्णु भगवान् और लक्ष्मी जी से विदा होकर इंद्र लोक आगये ! यहाँ उनहोंने देवेन्द्र से विष्णु भगवान् से हुई वार्ता पर चर्चा की और पृथ्वी पर जाने की अपनी इच्छा देवेन्द्र को बदलाई ! नारद जी बोले, "देवराज इंद्र पहले की बात तो और थी मैं पैदल ही तीनों लोकों का भ्रमण कर लेता था, तीनों लोकों में मेरे भक्त जो थे, उन में देवता, मनुष्य और राक्ष भी थे ! यात्रा निरापद थी, कोई किस्म का जोखिम नहीं था ! लेकिन इक्कीसवीं सदी के आते ही सूना है पृथ्वी पर आतंकवाद, नक्षलवाद, मावोवाद, वोडोवाद, और भी कही तरह के शांती, सदाचार, सच्चाई, ईमानदारी के दुश्मन अपना पैर जमाने लगे हैं ! क़ानून व्यवस्था नाम की कोई चीज ही धरती पर नहीं रह गयी है ! दिन दहाड़े लूट पा ट , छीना झपटी, चोरी डकैती, व्यभिचार, भ्रष्टाचार, रिश्वत खोरी, जमा खोरी, का बाजार गर्म है ! सारे डकैत शासन की बाग़ डोर संभाले हुए हैं, क़ानून तोड़ने वाले क़ानून बना रहे हैं ! ऊपर से प्रदूषण नामक एक नया दैत्य धरती पर पैदा हो गया है जो धरती के हवा पानी, ताल तल्लैया, गंगा यमुना सरस्वती के पवित्र जल में घूल मिल कर अपने जहर से पृथ्वी के मानव और जीव जंतु को अकाल मृत्यु के मुंह में डाल रहा है ! जर जमीन और जोरू के लिए भाई भाई का दुश्मन बन रहा है, बेटा बाप का गला काट रहा है ! स्वार्थ के आगे सारे नाते रिश्ते फीके पड़ गए हैं ! ऐसी हालत में पैदल यात्रा करना बड़ा जोखिम का काम है, यहाँ तक समाचार है पैदल चलने वालों का अपहरण कर दिया जाता है और फिर फिरौती में बहुत बड़ी रकम की मांग की जाती है, न देने पर ह्त्या तक की जाती है ! विष्णु भगवान का आदेश है जाना भी जरूर है ! क्या आपके वाहनों में से कोई एक वाहन वायु की गति से मुझे धरती पर ले जा सकता है और पूरे विश्व की यात्रा करके वापिस देवलोक पहुँच सकता है" ? इंद्र बोले, "देव ऋषि वाहन देने में मुझे कोई ऐतराज नहीं है और मेरे पास ध्वनी की गति से भी तेज गति के वाहन हैं लेकिन मेरी भी एक मजबूरी है, आज सारे वाहन पूरी तरह से सुरक्षा पर तैनात हैं ! अभी हाल ही में धरती के असामाजिक तत्व के लोग (भाई लोग, गैगेस्टर, भ्रष्ट मंत्री, चोर डकैत) धरती से मर कर गए तो नरक में थे पर पता नहीं किसकी सिफारिस से यहाँ देव लोक पहुँच गए और उनहोंने आते विष्णु भगवान के शंख, चक्र, गद्दा और पद्म चुरा दिए, सारे वाहन चोरों को ढूँढने और विष्णु भगवान की इन बहुमूल्य वस्तुवों को वापिस लाने में जुटी है ! मैं आपकी इस छोटी सी मांग को भी पूरी करने में असमर्थ हूँ तथा बहुत लज्जित हूँ !" (दूसरा भाग)
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