शनिवार, 2 जुलाई 2011
नारद जी फिर धरती पर आए
पिछली बार जब नारद जी विष्णु भगवान् जी से मिलने क्षीर सागर शेष शैय्या पर पहुंचे तो भगवान् जी आँखें मूंदे गहन विचारों में लींन थे ! लक्ष्मी जी उनके चरणों में बैठी उन्हें अलोट पलोट रही थी ! नारद जी को आते देखकर उनहोंने अपना सिर ढक लिया प्रणाम किया आशीर्वाद लिया और बैठने के लिए आसन दिया ! इतने में विष्णु भगवान् जी के अलसाए नेत्र भी खुल गए, "बोले कहो नारद, क्या खबर लाए हो ? इन दिनों कभी मृत्यु लोक जाना हुआ ? अगर नहीं गए तो चले जाना और वहां के ताजे समाचार लेकर आना" ! नारद जी बोले , "भगवन इस इक्कीसवीं सदी में तो पृथ्वी पर जाना नहीं हो सका लेकिन अब जल्दी ही जाउंगा और आपके आदेश का पालन करूंगा ! " कुछ इधर उधर की बातें हुई और फिर नारद जी विष्णु भगवान् और लक्ष्मी जी से विदा होकर इंद्र लोक आगये ! यहाँ उनहोंने देवेन्द्र से विष्णु भगवान् से हुई वार्ता पर चर्चा की और पृथ्वी पर जाने की अपनी इच्छा देवेन्द्र को बदलाई ! नारद जी बोले, "देवराज इंद्र पहले की बात तो और थी मैं पैदल ही तीनों लोकों का भ्रमण कर लेता था, तीनों लोकों में मेरे भक्त जो थे, उन में देवता, मनुष्य और राक्ष भी थे ! यात्रा निरापद थी, कोई किस्म का जोखिम नहीं था ! लेकिन इक्कीसवीं सदी के आते ही सूना है पृथ्वी पर आतंकवाद, नक्षलवाद, मावोवाद, वोडोवाद, और भी कही तरह के शांती, सदाचार, सच्चाई, ईमानदारी के दुश्मन अपना पैर जमाने लगे हैं ! क़ानून व्यवस्था नाम की कोई चीज ही धरती पर नहीं रह गयी है ! दिन दहाड़े लूट पा ट , छीना झपटी, चोरी डकैती, व्यभिचार, भ्रष्टाचार, रिश्वत खोरी, जमा खोरी, का बाजार गर्म है ! सारे डकैत शासन की बाग़ डोर संभाले हुए हैं, क़ानून तोड़ने वाले क़ानून बना रहे हैं ! ऊपर से प्रदूषण नामक एक नया दैत्य धरती पर पैदा हो गया है जो धरती के हवा पानी, ताल तल्लैया, गंगा यमुना सरस्वती के पवित्र जल में घूल मिल कर अपने जहर से पृथ्वी के मानव और जीव जंतु को अकाल मृत्यु के मुंह में डाल रहा है ! जर जमीन और जोरू के लिए भाई भाई का दुश्मन बन रहा है, बेटा बाप का गला काट रहा है ! स्वार्थ के आगे सारे नाते रिश्ते फीके पड़ गए हैं ! ऐसी हालत में पैदल यात्रा करना बड़ा जोखिम का काम है, यहाँ तक समाचार है पैदल चलने वालों का अपहरण कर दिया जाता है और फिर फिरौती में बहुत बड़ी रकम की मांग की जाती है, न देने पर ह्त्या तक की जाती है ! विष्णु भगवान का आदेश है जाना भी जरूर है ! क्या आपके वाहनों में से कोई एक वाहन वायु की गति से मुझे धरती पर ले जा सकता है और पूरे विश्व की यात्रा करके वापिस देवलोक पहुँच सकता है" ? इंद्र बोले, "देव ऋषि वाहन देने में मुझे कोई ऐतराज नहीं है और मेरे पास ध्वनी की गति से भी तेज गति के वाहन हैं लेकिन मेरी भी एक मजबूरी है, आज सारे वाहन पूरी तरह से सुरक्षा पर तैनात हैं ! अभी हाल ही में धरती के असामाजिक तत्व के लोग (भाई लोग, गैगेस्टर, भ्रष्ट मंत्री, चोर डकैत) धरती से मर कर गए तो नरक में थे पर पता नहीं किसकी सिफारिस से यहाँ देव लोक पहुँच गए और उनहोंने आते विष्णु भगवान के शंख, चक्र, गद्दा और पद्म चुरा दिए, सारे वाहन चोरों को ढूँढने और विष्णु भगवान की इन बहुमूल्य वस्तुवों को वापिस लाने में जुटी है ! मैं आपकी इस छोटी सी मांग को भी पूरी करने में असमर्थ हूँ तथा बहुत लज्जित हूँ !" (दूसरा भाग)
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