सोमवार, 4 जुलाई 2011

नारद जी धरती पर आए - चौथी किस्त

लगता है इन सैनिकों में जो वरिष्ट सैनिक बैठे थे वे एक सूबेदार रैंक के थे ! सैनिक जीवन में उनहोंने जिन्दगी का हर पहलू देखा था ! उनहोंने, बिल्यू स्टार औप्रेसन, कारगिल वार और ७१ की लड़ाई में भी हिस्सा लिया था, उनहोंने सैनिकों की तड़पती हुई लाशें भी देखी थी, कही बार मौत को लौटते हुए भी देखा था !लोंगेवाला में एक गोला उनसे कुछ ही दूरी पर गिरा था लेकिन फटा नहीं, और उनके सारे साथी सुरक्षित बच गए थे ! उस समय उनकी सर्विस केवल एक साल की थी, ट्रेनिंग पूरी होते ही वे यहां मोर्चे पर पोस्ट कर दिए गए थे ! वे उस युद्ध के बारे में बताते हैं की, " भारतीय सेना की केवल एक कंपनी यहाँ पर तैनात थी! यद्यपि हमारा पूरा डिविजन किशनगढ़ इलाके में तैनात था ! पाकिस्तान अपने टैंकों से लोगोंवाला पर अटैक कर देगा इसकी संभावना कम थी, लेकिन पाकिस्तान ने गहरे नालों में अपने टैंकों को उतार कर असंभव को संभव कर दिया और इन दुर्गम घाटियों में अटैक का नया रास्ता ढूंढ लिया ! एक बार तो लगा था की टैंकों की इस चौतरफा बमबारी से कोई भी ज़िंदा नहीं बच पाएगा लेकिन तभी हमारी वायुसेना के फाईटरों ने गोलाबारी की और पाकिस्तानी डिविजन के सारे टैंक एक घंटे के अन्दर तोड़ डाले गए ! पाकिस्तानी डिविजन का रामगढ़ के रास्ते जैसलमेर पर अटैक करने का स्वप्ना ख़त्म कर दिया गया ! पाकिस्तान को जान माल का बहुत नुकशान हुआ ! हमारे काफी सैनिक भी वीर गति को प्राप्त हुए ! सूबेदार साहब बोले, ये सब प्रभु की कृपा थी, की हमारी रक्षा के लिए उनहोंने लड़ाकू विमान भिजवा दिए ! सैनिक की जिन्दगी का कोई भरोषा नहीं रहता, इसलिए हमारी सेना की हर बटालियन में हर धर्म के मानने वालों के लिए मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा और चर्च की व्यवस्था रहती है ताकी लड़ाई में, आतंकवादियों के खिलाफ, कुदरती आपदाओं में, बाढ़ - भूचाल जैसे कहर बरपाने वाली घड़ी में आम लोगों के बचाव में जाने से पहले उस परपिता परमात्मा का स्मरण किया जा सके ! इस ७१ की लड़ाई में हमारे अफसर, सरदार और जवान बड़ी संख्या में शहीद हुए, कही माँवों ने बेटे खोये, कही नव योवनाओं के सुहाग उजड़े, कही बच्चों के सर से बाप की छाया उठ गयी, और नेताओं ने क्या किया जीती हुई जमीन पाकिस्तान को वापिस कर दी" ! इसी समय उस कम्पार्टमेंट में दो साधू आकर दरवाजे के पास ही खड़े हो गए ! डिब्बा पैक्ड था, एक सैनिक ने दोनों साधू जो डील डौल चहरे मोहरे से साधू ही लग रहे थे, उन्हें अपनी सीट पर बिठा दिया और स्वयं खड़ा हो गया ! एक साधू दूसरे से बोला, "देखा भारतीय संस्कृति और सभ्यता, ये सैनिक देश की सुरक्षा तो करते ही हैं साथ ही मानव सेवा भी करते हैं ! इन लोगों का दिल कितना बड़ा है ! वीर सैनिकों तुम सदा अजर अमर रहोगे, आने वाले पीढी तुम्हारी वीरता, दानवीरता, शील स्वभाव, दूसरों के प्रति आदरभाव, कर्तव्य परायणता, ईमानदारी और वफादारी की मिशालें देगी ! तुमने अपनी सीट हमीं दी और देखो जगह काफी हो गयी और अब हम सब आराम से बैठ सकते हैं ! " और सचमुच में सभी लोग सीटों में एडजस्ट हो गए कोई नीचे नहीं बैठा था ! गाडी अब देहरादून स्टेसन पर रुक गयी थी ! सभी के साथ साथ नारद जी भी गाडी से बाहर आगये ! सोचा चलो पहले हरिद्वार चल कर गंगा स्नान का लाभ प्राप्त कर लें ! वे हरिद्वार हर की पैडी पर आये, देखा सारी गंगा प्रदूषित हो चुकी है, कितने कितने कार खानों की गन्दगी, लाशें राख इस पवित्र गंगा में मिलाई जा रही हैं, बहुत बड़ी मात्रा में बालू रेता नदी से बाहर ले जाया जा रहा है ! गंगा वो असली गंगा जो भागीरथ के अथक तपस्या और परिश्रम से ब्रह्मा जी के कमंडल से बाहर निकालकर शिव जी की जटा से होते हुए धरती पर उतारी गयी थी, जो कलतक पतीत पावनी गंगा जी से जानी जाती थी वो असली गंगा कहाँ खो गयी ! नारद जी ने इस गंगा के पानी को छुआ तक नहीं ! यहीं से वे ऋषिकेश होते हुए तेहरी पहुंचे !

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