रविवार, 3 जुलाई 2011

नारद जी धरती पर आए - तीसरा भाग

अचानक नारद जी के दिमाग में एक विचार आया की जब मैं पिछली बार पृथ्वी पर आया था तो गढ़वाल और कुमायूं की मनोहर घाटियों, नदियों और पहाड़ पर्वतों को मिलाकर यहाँ के स्थानीय निवासी एक अलग प्रदेश की मांग कर रहे थे, मुलायमसिंह नामक अत्याचारी आन्दोलनकारियों के ऊपर कहर बरपा रहे थे, चल कर देखना चाहिए की ये कुदरत की गोद में पले पर्वत वासी अपना अलग राज्य लेने में तो कामयाब हो गए लेकिन उस नए राज्य की शासन व्यवस्था कैसे चल रही है, चलकर देखना चाहिए ! वे वहां से सीधे पुराणी दिली के रेलवे स्टेशन आए, वहां वही रेल पेल ठेलम ठेल शोर शराबा, भीड़ भडाका ! एक बार तो वे भी चकरा गए, लेकिन वे तो अदृश्य होकर चल रहे थे, न टिकट का झंझट न कोई आरक्षण की जोर आजमाइस की जरूरत ! जैसे ही मंसूरी एक्सप्रेस स्टेशन पर रुकी, जनरल बोगियों में चढ़ने की होड़ लग गयी, धक्का पेली, दोनों हाथों में भारी भरकम सामान दरवाजे पर अड़ गए, न बाहर न भीतर, पीछे वाला उनके सिर के ऊपर से बोक्स, विस्तरा भीतर खिसका रहा था, कुछ मन चले पहले ही भीतर जाकर सीट घेरे बैठे थे या ऊपर की सीटों पर पैर पसार कर लेटे थे ! जिनके साथ में छोटे छोटे बच्चे थे और भारी सामान था वे कुली की मदद ले रहे थे और कुली को मुंह मागा पैसा दे रहे थे ! चोर उच्चके जेब कतरों की बहार आ रही थी और अनजान शरीफ मुसाफिरों की जेब कट रही थी ! रेलवे पुलिस, स्थानीय पुलिस दूर खड़े होकर तमाशा देख रहे थे और सिगरेट या बीडी का धुंवा उड़ा रहे थे ! बड़े लोग मंत्री, एम पी, एल एम ए सचीव तबके के अधिकारी, रसूक वाले लोग आ रहे थे और वातानुकूल प्रथम श्रेणी या द्वितीय श्रेणी वातानुकूल आरक्षण डिब्बों में जाकर आराम से बैठे थे, उनके नौकर, चपरासी, या फिर रेलवे के कर्मचारी उनके सामान निर्दिष्ट स्थानों पर जचा रहे थे ! यहाँ गरीब बहुत ही गरीब गरीबी लाइन से बहुत नीचे थे तो ऊपर वाले बहुत ही ऊंचे थे ! नारद जी देख कर हैरान थे की क्या यही आजाद भारत की असली तस्वीर है ? जहां संविधान में तो सबको समानता का अधिकार है, यह एक धर्म निरपेक्ष, प्रतान्त्रिक, लोकतांत्रिक सार्वभौमिक राज्य है ! लेकिन असल में आरक्षण है, विभाजन है, अमीरी गरीबी है, बड़ा छोटा है वह सब कुछ है जो अंग्रेज छोड़ गए थे, फर्क इतना है वे गोरी चमड़ी के शासक थे डंडे बरसाने वाले ये काली चमड़ी के शासक हैं ! नारद जी भी किसी आरक्षण डिब्बे में जाकर बैठ गए ! उसमें कुछ सैनिक बैठे थे, कोई कारगिल के ग्लेसियरों से तो कोई लेह लद्दाक, श्रीनगर, बारामुला, पूँछ घाटी से सालाना दो महीने के अवकास पर जा रहे थे ! इन्होंने पूरा डिब्बा सैनिकों के नाम से आरक्षित कर लिया था, पर भीड़ इसमें भी बड़ी थी ! एक सैनिक जो बरिष्ट लग रहा था और कन्धों में दो फूल लगाए था सबको संभाले हुए था ! एक सैनिक बोला सर जी अब और कितना खून बहाना पडेगा इस काश्मीर के लिए ! कल दश आतंकवादी आये, कैम्प में गोली बारी की दश जवान मारे गए, हमने भी मजबूरी में गोली चलाई उनके सारे आतंकी ढेर कर दिए, देखा अगले दिन राज्य सरकार और अलगाव वादी उनकी लाशों को लेकर क्या शोर शराबा मचा रहे थे ! पूरा दोष सैनिकों पर डाल रहे थे ! जानते हुए भी की वे सारे आतंकवादी पाकिस्तानी थे और आतंक फैलाने के लिए काश्मीर में घूस आये थे ! और ये केन्द्रीय सरकार, .....? वरिष्ट सैनिक बोले रहने भी दो अब इन बातों को,, काश्मीर के जहरीले बीज किसने बोये थे, देश का विभाजन किसने करवाया जो शासन पर आसीन हैं ! काश्मीर में जेहाद किसने भड़काया जनता को सब पता है लेकिन जरिया भी तो कोई नहीं है, विपक्ष भी तो वोट बैंक भुनाने के लिए अल्प संख्यक का सहारा ले रही है और देश की सुरक्षा डाव पर लगा रही है ! वो अफजल गुरु जो पूरे संसद को उड़ाने वाला था, १३ सुरक्षा कर्मी मरे थे उसमें, सांसदों को बचाने में ! उसे फांसी की सजा सुप्रीम कोर्ट से मिल गयी लेकिन वो कौन है सरकार में बैठा की उसे फांसी पर लटक वाने में अड़चन पैदा कर रहा है ! सुना है उसकी सुरक्षा और रख रखाव पर सरकार रोज करोड़ों खर्च कर रही है ! जिस देश में एक आतंक वादी की पूजा हो रही है उस देश को बचाने के लिए भगवान को फिर अवतार लेना पडेगा ! (बाकी चौथा पेज में)

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