सोमवार, 18 अक्टूबर 2010

मेरी कहानी (बतीसवां भाग)

दो हजार नौ में मेरा गढ़वाल जाने का चक्कर लगता रहा ! इस बीच मैं ढून्ढूभी नामक साप्ताहिक पत्रिका से जुड़ गया ! मेरे ममेरे भाई स्वर्गीय श्री भूपेन्द्रसिंह जी ने "ठहरो" नामक साप्ताहिक पेपर निकाला था ! जब तक वे रहे नियमित तौर पर यह पेपर चलता रहा ! उनके बाद इस पेपर की बागडोर इनके सुपुत्र सुधीन्द्र नेगी ने संभाली ! अब इस का नाम ठहरो से ढून्ढूभी रख दिया गया है ! यह साप्ताहिकी ज्यादातर जंगल और प्रयावरण से समबन्ध रखने वाले लेख, कवितायेँ, सस्मरण को ही ज्यादा तबजो देती है ! इन्हीं दिनों इस पेपर के माध्यम से सुधीन्द्र नेगी ने एक स्मारिका निकाली और उसके विमोचन के शुभ अवसर पर मैं और मेरा बेटा ब्रिजेश भी वहां झिन्डी चौड़ में मौजूद थे ! स्मारिका का विमोचन श्री रावत जी (चीफ कन्सर्वेटर) के कर कमलों से संमापन हुआ ! इस समारोह में बहुत सारे पुराने नए लोगों से भी मुलाक़ात हुई !
काफी सालों बाद मैंने दिल्ली में १५ अगस्त, दिवाली, दशहेरा परिवार के साथ मनाया ! आम खूब खाए और मकई वह भी ताजी ताजी भूनी हुई का स्वाद लिया ! झिन्डी चौड़ जहाँ सन १९५४ तक बिलकुल जंगल था और गढ़वाल के उन लोगों को जिनके पास जमीन नहीं थी उन्हें यह जमीन बांटी गयी थी प्रांतीय सरकार की ओर से ! उन दिनों मेरे मामा गोकुलसिंह जी अपने परिवार के साथ यहाँ जंगल में आये थे ! और आज मामा जी की तीसरी पीढी (सुधीन्द्र मेरे मामा जी के पौते हैं ) उनकी धरोहर की देख भाल कर रहे है ! सुधीन्द्र ने अपने बड़े बेटे जो इस समय गढ़वाल राईफल्स में सेवारत है की शादी कर ली है और मैं और ब्रिजेश इस शादी में सामिल हुए थे ! दादा लोगों ने
परेशानियां उठाई, मेहनत की और आज उनके नाती पोते उनकी मेहनत के फलों का स्वाद ले रहे हैं !
अब के मैं और मेरी पत्नी जून की १४ तारीख को ब्रिटिश इयर वेज से लन्दन होते हुए अमेरिका पहुंचे ! इन दिनों यहाँ का मौसम बड़ा ही सुहावन रहता है ! मई से सितम्बर तक वारीश भी होती है, हवाएं भी चलती हैं, कभी धूप कभी छाँव ! फिर सितम्बर सम्माप्त होने और अक्टूबर आते ही मौसम भी करवट बदलने लगता है ! राजेश के बहुत सारे ऐ ऐ टी के दोस्त यहाँ पर हैं, कुछ १०-१५ मील पर हैं कुछ ३०-४० मील के दायरे हैं और ये सभी लोग दो हफ्ते या महीने में एक बार जरूर मिल लेते हैं ! मकान सभी के अपने हैं जहाँ सारी सुविधाएं जैसे, पार्क, बच्चों के खेल, स्विमिंग पूल, टेनिस कोर्ट मौजूद हैं ! सर्दियों में स्वीमिंग पूल बंद हो जाते हैं लेकिन लोग अपने बच्चों को ३०-४० मील दूर स्वीमिंग कोचिंग के लिए ले जाते हैं ! यहाँ भी काम हफ्ते में पांच ही दिन चलता है और बाकी दो दिन बच्चों के मनोरंजन के लिए होते हैं ! इस तरह यहाँ की जिन्दगी चलती फिरती रहती है कभी आराम नहीं करती, यही इस कंट्री की विकास की कहानी है ! हर कोई आज के लिए जीता है और खुश रहता है ! कोई जमा नहीं चोरी नहीं, न काला धन ! अपना धन अपने देश में ! न काम चोरी न टैक्स चोरी ! जनता का पैसा जनता पर ही खर्च किया जाता है ! जो जिस विभाग का मंत्री उस विभाग की डिग्री है उस के पास ! चोरी हेरा फेरी यहाँ भी होती है पर ५% बाकी ९५% काम होता है ! यही कारण है की अमेरिका की खोज कोलंबस ने १४९२ ई० में की वह भी इंडिया समझ कर, उस समय यहाँ के लोग बिलकुल जंगली हालत में थे ! पैदावार के नाम केवल एक फसल मकई (भुट्टा) यहाँ पैदा होती थी ! हथियार के नाम इनके पास धनुष बाण, लोहे का गंडासा, छुरी, चाकू होते थे और इन्ही से ये लोग जंगली भैंसे, जंगली बकरे, खरगोस, हिरन का शिकार करते थे ! अलग अलग कबिले अलग अलग नामों से गाँव बसाकर रहते थे ! एक कबीला दूसरे कबीले के ऊपर अटैक करके मारकाट करके धन और जवान औरतों को लूट कर ले जाते थे ! कपड़ों के नाम से जंगली जानवरों की खाल बदन पर लपेटे रहते थे ! यहाँ के लेखक, उपन्यासकार, इतिहासकार इन जन जातियों को इन्डियन कहते हैं ! जब की भारत देश जब सिकंदर ने ३२५ ई० पू० पोरस पर अटैक किया था यहाँ के लोग कपडे पहिनते थे, अच्छे हथियार रखते थे और कही किस्म की खेती करते थे ! उस समय शिक्षा के लिहाज से भारत में दो विश्व विद्यालय थे, नालंदा और तक्षशिला जहां विश्व भर के विद्यार्थी विद्याध्यन के लिए आते थे ! हाँ जन जातियां ठीक अमेरिका में रहने वाले गाँवों में रहने वाली जन जातियों की तरह ही रहते थे ! १८१०-१५ तक अमेरिका के उत्तर-पश्चिम पर्वतीय इलाके बहुत पिछड़े थे और आज पूरा अमेरिका विश्व का नंबर वन स्थान पर है ! और हमारा भारत .....!
मेरे छोटे बेटे ब्रिजेश ने कोटद्वार में पाईन नीडल (चीड की पती वनाम पिरूल) से फायर ब्रिक्स बनाने की एक छोटी सी फैक्टरी लगा रखी है ! ये फायर ब्रिक्स कोयले की जगह ले रहा है ! ये पिरूल गर्मी शुरू होते ही गिरना शुरू हो जाता है और मई जून के महीनों में जंगलों में आग लगने का कारण बनता है ! हर साल इससे लगने वाली आग से जंगलात का करोड़ों की सम्पति जल कर राख होती है ! विश्व में जहां भी चीड के जंगल हैं वे सभी देश इसकी पत्तियों से परेशान हैं ! वातावरण में बढ़ते हुए प्रदूषण पर ये फायर ब्रिक्स अंकुश लगाने में सक्षम है ! प्रदूषण एक विश्व की समस्या है और जो भी संस्था, देश इस प्रदूषण पर कंट्रोल करने में सहयोग कर रहा है विश्व के बहुत से देश उस संस्थान और उस फैक्टरी में दिल चस्पी ले रहे है ! कोटद्वार में इसको देखने के लिए अभी तक स्वीटजर लैंड और जर्मनी के पत्रकार और टेलीविजन के लोग यहाँ आ चुके हैं ! इन्हीं दिनों ऐ ऐ एम अहमदाबाद ने नए नए उद्योग धंधों से जुड़े लोगों को इस इंस्टीच्यूट में बेसिक प्रशिक्षण देने के लिए निमंत्रित किया था ! सोलह हजार लोगों ने अप्लाई किया, जिसमें ६० लोग प्रशिक्षण के लिए चुने गए, जिसमें ब्रिजेश भी एक था ! इन ६० लोगों को ऐ ऐ एम अहमदाबाद ने १० अक्टूबर से २० अक्टूबर २०१० तक प्रशिक्षित किया ! २०अक्तूबर 2010 को भी कुछ लोग गढ़वाल भ्रमण को आए हैं और उनका पूरा भ्रमण का प्रोग्राम ब्रिजेश ने ही तैयार किया है जिसमें हमारी फैक्टरी भी सामिल है !

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें